राघव मल्होत्रा की उँगलियाँ तेज़ी से स्क्रॉल कर रही थीं। इंस्टाग्राम। फिर वापस। फिर आगे। "सुन," उसने अपनी पत्नी प्रिया को आवाज़ लगाई, जो बाथरूम में हज़ारों रुपये वाला कोई क्रीम लगा रही थी — किसी विज्ञापन में देखकर मँगाया था। "शर्मा जी के बेटे ने मालदीव की तस्वीरें डाली हैं।" "तो?" प्रिया ने आईने …
राघव मल्होत्रा की उँगलियाँ तेज़ी से स्क्रॉल कर रही थीं।
इंस्टाग्राम। फिर वापस। फिर आगे।
“सुन,” उसने अपनी पत्नी प्रिया को आवाज़ लगाई, जो बाथरूम में हज़ारों रुपये वाला कोई क्रीम लगा रही थी — किसी विज्ञापन में देखकर मँगाया था। “शर्मा जी के बेटे ने मालदीव की तस्वीरें डाली हैं।”
“तो?” प्रिया ने आईने में देखते हुए कहा।
“तो हमें भी जाना चाहिए। अक्टूबर में। मेरा जन्मदिन है।”
प्रिया बाहर आई। आँखों में वही चमक थी जो हर बड़े इरादे से पहले आती थी।
“और किश्त?”
“होती रहेगी।” राघव ने फोन रखा। “ज़िंदगी एक बार मिलती है।”
यह उनका सबसे पसंदीदा जुम्ला था।
दिल्ली के द्वारका में मल्होत्रा परिवार का घर बाहर से एक सफल ज़िंदगी की तस्वीर था।
दरवाज़े पर एक बड़ी जर्मन गाड़ी खड़ी थी — हर महीने बावन हज़ार की किश्त। अंदर एक महँगा फोन था जिसकी किश्त अभी चौदह महीने बाकी थी। दीवार पर एक बड़ा सा टेलीविज़न लटका था जो ज़्यादातर सजावट के काम आता था — दोनों अपने फोन पर ही सब देखते थे।
और हर सप्ताहांत — कोई न कोई बड़ा रेस्तराँ, कोई छत पर बना कैफे, कोई रोशन बाज़ार — जहाँ असली मकसद तस्वीर लेना था, खाना तो बस पीछे की पृष्ठभूमि था।
राघव एक कंपनी में मध्यम स्तर का अधिकारी था। तनख्वाह थी एक लाख दस हज़ार। और हर महीने की देनदारी थी:
घर की किश्त अड़तीस हज़ार। गाड़ी की किश्त बावन हज़ार। गोवा वाले कर्ज़ की किश्त बारह हज़ार। उधार कार्ड का न्यूनतम भुगतान आठ हज़ार। फोन की किश्त चार हज़ार।
कुल मिलाकर — जो आता था, वो जाता था। और फिर भी — हर हफ्ते कोई नई तस्वीर, नई कहानी, नई झलक।
प्रिया के ग्यारह हज़ार अनुयायी थे। राघव के साढ़े छः हज़ार। दोनों मिलकर दुनिया को यह दिखाने में लगे थे कि वो कितना शानदार जी रहे हैं।
फिर वो फोन आया जिसका किसी को इंतज़ार नहीं था।
राघव की माँ — मथुरा में — अस्पताल में थीं। दिल का दौरा।
राघव ने फोन रखा और कुछ नहीं बोला। एक अजीब सी चुप्पी कमरे में फैल गई।
“कब निकलना है?” प्रिया ने धीरे से पूछा।
“अभी।”
गाड़ी की डिक्की में किसी आने वाली यात्रा का सामान भरा था। राघव ने वो हटाया, ज़रूरी कपड़े ठूँसे, और वो निकल पड़े — रात के दो बजे — दिल्ली से मथुरा की तरफ।
माँ बच गईं। लेकिन बमुश्किल।
डॉक्टर ने कहा, “तनाव। घबराहट। और घर में कोई नहीं था उनके साथ।”
वो जुम्ला राघव के भीतर किसी नुकीली चीज़ की तरह उतर गया।
कोई नहीं था।
वो सप्ताहांत पर गोवा में था। किसी छत पर था। तस्वीरें खींच रहा था।
माँ अकेली थीं।
मथुरा में तीन दिन रुकने के बाद, माँ के कहने पर, वो दोनों वृन्दावन गए — माँ की एक पुरानी मनौती पूरी करने।
और वहीं — वृन्दावन की संकरी गलियों में — असली दुर्घटना हुई।
लेकिन गाड़ी की नहीं।
उनकी ज़िंदगी की।
वृन्दावन में पहला दिन था।
बाँके बिहारी मंदिर की भीड़ में प्रिया ने अपने आप फोन निकाला — कुछ बनाने के लिए। लेकिन भीड़ इतनी थी, रोशनी इतनी कम थी, और माहौल इतना गहरा था कि फोन कब जेब में वापस गया, उसे पता ही नहीं चला।
वो बस खड़ी रही।
कीर्तन की आवाज़। घंटों की गूँज। लोगों की आँखों में कुछ था जो उसने दिल्ली में कभी नहीं देखा था।
चैन।
वो चैन जो बड़े टेलीविज़न से नहीं आता। जो मालदीव की तस्वीरों से नहीं आता।
बाहर आकर राघव ने कहा, “कुछ अजीब है यहाँ।”
“हाँ,” प्रिया बोली। “यहाँ लोग हमें देख नहीं रहे।”
राघव ने भौंहें उठाईं।
“मतलब?”
“मतलब — कोई ध्यान नहीं दे रहा हमें। बड़ी गाड़ी बाहर खड़ी है। मेरी जैकेट महँगी है। तुम्हारी घड़ी कीमती है। और किसी को फर्क नहीं पड़ रहा।”
यह एक टिप्पणी थी। लेकिन उसके भीतर एक घाव था।
शाम को वो यमुना के किनारे गए।
वहाँ एक बुज़ुर्ग औरत बैठी थीं। सफेद साड़ी। कोई गहना नहीं। एक छोटी सी पोटली। और चेहरे पर वो भाव जो राघव और प्रिया ने कभी किसी में नहीं देखा था —
पूर्ण संतोष।
प्रिया उनके पास बैठ गई। बोली, “माताजी, यहाँ रहती हैं?”
बुज़ुर्ग महिला ने मुस्कुराया। “अब हाँ।”
“पहले?”
“पहले गुड़गाँव में। एक बड़ी कंपनी में मुख्य वित्त अधिकारी थी।”
राघव चौंका। “इतने बड़े पद पर?”
“हाँ।” उनकी आवाज़ में न पछतावा था, न दिखावा। “पैकेज था डेढ़ करोड़ सालाना। घर था पॉश इलाके में। दो गाड़ियाँ। बेटे की स्कूल फीस तीन लाख सालाना।”
“तो फिर…?” प्रिया ने पूछा।
“फिर एक दिन पति गए। दिल का दौरा। उनचास साल की उम्र में।”
वो रुकीं। यमुना की लहरें आती रहीं।
“उस रात मैंने सोचा — हम दोनों इतना कमा रहे थे किसके लिए? किसे दिखा रहे थे? पड़ोसियों को? जो उस रात हमारे घर नहीं आए? रिश्तेदारों को? जो संदेश भेजकर व्यस्त हो गए?”
“तीन महीने बाद मैंने इस्तीफा दे दिया। बेटे को उसके दादा-दादी के पास छोड़ा। और यहाँ आ गई।”
“जमा-पूँजी?” राघव ने पूछा।
“थी। एक हिस्सा बेटे के लिए रख दिया। एक हिस्सा दान में दिया। बाकी से यहाँ एक छोटा सा कमरा है। बस।”
“पछतावा नहीं?” प्रिया की आवाज़ में सच्ची जिज्ञासा थी।
माताजी ने उनकी तरफ देखा। सीधे आँखों में।
“पछतावा तो तब था। जब हर सप्ताहांत हम किसी बड़े बाज़ार में होते थे यह सोचकर कि हम आनंद ले रहे हैं। लेकिन रविवार की रात — जब अगले सोमवार का डर आता था — तब समझ आता था कि हम भाग रहे हैं। खुशी की तरफ नहीं —
डर से।“
वो बात राघव के सीने में कहीं जाकर रुक गई।
उस रात एक साधारण से लॉज में — प्रिया ने अपना फोन खोला।
उनकी आखिरी तस्वीर थी — एक महँगे रेस्तराँ में पास्ते की। आठ सौ सैंतालीस पसंद। बासठ टिप्पणियाँ।
उसने टिप्पणियाँ पढ़ीं।
“वाह, बहुत सुंदर!” “तुम लोग तो बस जीते हो!” “जलन हो रही है!”
और एक — उसकी असली सहेली मीना की: “कभी फोन कर। याद आती है।”
मीना को उसने तीन महीने से फोन नहीं किया था।
प्रिया ने फोन रखा।
“राघव।”
“हाँ।”
“ये सब लोग जो हमारी तस्वीरों पर टिप्पणी करते हैं — इनमें से कितने हैं जो सच में आएँगे अगर कभी कुछ हो जाए?”
राघव ने छत को देखा।
“माँ के वक्त पर — अस्पताल में — दिल्ली के कितने दोस्तों ने फोन किया?”
राघव याद करने लगा।
एक। दो। शायद तीन।
आठ सौ सैंतालीस में से तीन।
अगली सुबह वो फिर यमुना किनारे गए।
माताजी वहीं थीं।
इस बार राघव ने खुद बैठकर पूछा, “माताजी, एक बात पूछूँ? क्या आपको कभी लगता नहीं कि दुनिया को दिखाना ज़रूरी है कि आप ठीक हैं? कि आप कुछ हैं?”
माताजी ने हँसते हुए कहा, “बेटा, जिस दिन तुम्हें सच में कुछ होने का अनुभव होगा — उस दिन दिखाने की ज़रूरत अपने आप खत्म हो जाएगी।”
“मतलब?”
“एक पेड़ जिसकी जड़ें गहरी हैं — वो आँधी में झुकता है, लेकिन उखड़ता नहीं। और वो किसी को साबित नहीं करता कि उसकी जड़ें गहरी हैं।”
राघव चुप रहा।
“तुम दोनों क्या दिखाते हो लोगों को?”
“खुशी।”
“और असल में?”
एक लम्बी चुप्पी।
“असल में…” प्रिया ने शुरू किया, फिर रुकी। “असल में हम थके हुए हैं। हर महीने हिसाब मिलाने की कोशिश में। हर सप्ताहांत किसी नई जगह जाने की योजना में। हर तस्वीर के लिए सही कोण ढूँढने में।”
माताजी ने कहा, “यही तो मेरे पति ने भी कहा था — उनके डॉक्टर को। जब उन्होंने पूछा था कि वो कैसे हैं। उन्होंने कहा था: ‘बिल्कुल ठीक हूँ।’ और तीन हफ्ते बाद वो चले गए।”
यमुना बहती रही।
वापसी दिल्ली की — गाड़ी में — खामोश थी।
राजमार्ग पर राघव ने एक बार आईने में देखा। पीछे वृन्दावन की धूल थी।
“प्रिया।”
“हाँ।”
“एक काम करें?”
“बोल।”
“घर जाकर एक सूची बनाते हैं। सब लिखते हैं। क्या है, क्या चाहिए, क्या सच में ज़रूरत है, और क्या सिर्फ दिखावा है।”
प्रिया ने खिड़की से बाहर देखा। राजमार्ग पर बड़े-बड़े विज्ञापन थे। शानदार फ्लैटों के। गाड़ियों के। छुट्टियों के।
“और फिर?”
“फिर ईमानदारी से तय करें। गाड़ी की किश्त — क्या सच में ज़्यादा खुशी दे रही है? या बावन हज़ार का बोझ?”
प्रिया कुछ नहीं बोली।
लेकिन उसने राघव का हाथ थाम लिया।
दिल्ली आने के दो हफ्ते बाद।
राघव के एक साथी ने दफ्तर में कहा, “यार, सुना तूने गाड़ी बेच दी?”
“हाँ।”
“क्यों? इतनी अच्छी तो थी। रुतबे की बात थी।”
राघव ने मुस्कुराया। “रुतबा था। असलियत नहीं।”
साथी उलझन में पड़ गया।
राघव को समझाने की ज़रूरत नहीं लगी।
प्रिया ने उस महीने एक तस्वीर डाली।
कोई महँगा रेस्तराँ नहीं। कोई डिज़ाइनर कपड़े नहीं।
बस एक तस्वीर — वृन्दावन में यमुना के किनारे। माताजी के साथ। और नीचे लिखा था:
“कुछ लोग मिलते हैं जो बिना एक पैसा खर्च किए हमसे ज़्यादा अमीर दिखते हैं। उनसे सीखना चाहिए।”
आठ सौ सैंतालीस की जगह दो सौ दस पसंद आए।
लेकिन मीना ने फोन किया। असली फोन। एक घंटे का।
और पहली बार बहुत दिनों में — प्रिया ने फोन रखने के बाद महसूस किया:
यह असली था।
छः महीने बाद।
बड़ी गाड़ी गई। एक ठीक-ठाक पुरानी छोटी गाड़ी आई। हर महीने बावन हज़ार की बचत।
कर्ज़ बंद हुआ। उधार कार्ड साफ हुआ।
माँ के पास हर दूसरे सप्ताहांत जाने लगे। मथुरा-वृन्दावन — जो पहले उबाऊ लगता था — अब एक अलग तरह का ठिकाना लगने लगा।
और प्रिया का फोन?
अनुयायी घटकर सात हज़ार रह गए।
लेकिन जो थे — वो सच्चे थे। जो टिप्पणियाँ आतीं — वो बातचीत होती थीं।
एक दिन उसने माताजी को संदेश किया।
“माताजी, आप ठीक हैं?”
जवाब आया — एक छोटा सा: “बेटा, मैं तो हमेशा ठीक हूँ। तुम बताओ।”
प्रिया ने लिखा: “हम भी अब ठीक हैं। सच में ठीक।”
उस रात राघव ने एक डायरी खोली — पहली बार ज़िंदगी में।
उसने लिखा:
“वृन्दावन में कोई नहीं था जो हमारी गाड़ी देखे। कोई नहीं था जो हमारी घड़ी पर ध्यान दे। कोई नहीं था जो हमारे कपड़ों की तारीफ करे।
और वो सबसे आज़ाद दिन था जो मैंने कभी जिया।”
— समाप्त —
कुछ दुर्घटनाएँ सड़क पर होती हैं। कुछ होती हैं भीतर। सड़क वाली दुर्घटनाओं में देह टूटती है। भीतर वाली में — भ्रम। और भ्रम का टूटना — शायद सबसे ज़रूरी दुर्घटना होती है।





