एक वरिष्ठ अधिकारी की वो रात — जो किसी को नहीं पता रात के दो बज रहे थे। नोएडा के सेक्टर 62 की सड़कें खाली थीं। सिर्फ एक सफेद गाड़ी थी — धीरे-धीरे चलती हुई। उसके अंदर एक आदमी था जिसके माथे पर पसीना था, हाथ स्टीयरिंग पर कसे हुए थे, और फोन की स्क्रीन …

Joan Robins
Joan Robins

I set up this blog to share interior design, travel and lifestyle inspiration for simple, relaxed living at home and beyond. You’ll find home tours, advice and tips, interviews, reviews, postcards from places I love and more – always with a focus on minimalism, muted colours and timeless, considered design.

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एक वरिष्ठ अधिकारी की वो रात — जो किसी को नहीं पता


रात के दो बज रहे थे।

नोएडा के सेक्टर 62 की सड़कें खाली थीं। सिर्फ एक सफेद गाड़ी थी — धीरे-धीरे चलती हुई। उसके अंदर एक आदमी था जिसके माथे पर पसीना था, हाथ स्टीयरिंग पर कसे हुए थे, और फोन की स्क्रीन पर एक एप्लीकेशन चल रही थी।

उस एप्लीकेशन पर उसका नाम था — “Driver: Vikram S.”

विक्रम श्रीवास्तव। उम्र सैंतालीस साल। पंद्रह साल का अनुभव। पिछली तनख्वाह — तीन लाख बीस हज़ार प्रतिमाह।

और आज की कमाई — दो सौ चालीस रुपये।


[ पहला अध्याय — सिस्टम क्रैश ]

छः महीने पहले।

विक्रम एक बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी में वरिष्ठ तकनीकी प्रबंधक थे। पाँच सौ लोगों की टीम नहीं — लेकिन उनके नीचे तीस इंजीनियर थे। क्लाउड इन्फ्रास्ट्रक्चर। माइक्रोसर्विसेज़। डेटा पाइपलाइन।

वो वो इंसान थे जिन्हें रात को फोन आता था जब प्रोडक्शन सर्वर डाउन होता था।

वो वो इंसान थे जो जानते थे — kubernetes cluster को कैसे stabilize करें। AWS का कौन सा region failover लेगा। microservice का कौन सा endpoint choke कर रहा है।

उन्होंने कंपनी को तीन बड़े outages से बचाया था। एक बार तो रात के तीन बजे — लैपटॉप लेकर बाथरूम में बैठकर — production database का corrupted transaction log manually fix किया था।

लेकिन—

जनवरी की एक सुबह — एक संदेश आया। पूरी कंपनी को।

“Global restructuring. AI-driven automation will replace several operational roles. Affected employees will be notified individually.”

विक्रम ने वो संदेश तीन बार पढ़ा।

चौथी बार नहीं पढ़ा।

उन्हें पता था इसका मतलब।


तकनीकी दुनिया में एक शब्द है — “deprecated”।

जब कोई पुरानी तकनीक, पुराना फ्रेमवर्क, पुराना एप्लीकेशन काम का नहीं रहता — तो उसे deprecated घोषित किया जाता है।

धीरे-धीरे हटाया जाता है।

विक्रम को पहली बार अपनी ज़िंदगी में यह शब्द खुद पर लागू होता लगा।

क्या मैं deprecated हो गया?


मानव संसाधन की बुलाहट आई — मार्च में।

बंद कमरा। दो लोग सामने। एक मुस्कुराता हुआ। जैसे बुरी खबर को मुस्कान में लपेट दिया हो।

“Vikram, your role has been identified for sunset. We’re moving to an AI-ops model. The functions you manage will be handled by automated monitoring tools — PagerDuty AI, Datadog’s Watchdog, and our new internal GPT-based incident resolution system.”

विक्रम ने एक पल के लिए उस वाक्य को तकनीकी नज़रिये से देखा।

PagerDuty AI — हाँ, वो alerts तो भेज सकता है। Datadog Watchdog — anomaly detection करता है, लेकिन root cause analysis? GPT-based incident resolution — कितनी बार hallucinate करेगा production में?

उनके मुँह तक आया — “यह सब tools मेरी जगह नहीं ले सकते।”

लेकिन वो नहीं बोले।

क्योंकि उन्हें पता था — यह तकनीकी बहस नहीं थी।

यह business decision था। और business decisions में इंसान की भावनाएँ नहीं देखी जातीं।

“छः महीने का मुआवज़ा मिलेगा। इस शुक्रवार आखिरी दिन।”

हाथ मिलाया। निकल गए।


लिफ्ट में।

विक्रम ने अपना लैपटॉप बैग कंधे पर महसूस किया। उसमें था — एक MacBook Pro, एक USB hub, दो chargers, और पाँच साल की मेहनत।

लिफ्ट नीचे आई।

दरवाज़ा खुला।

बाहर दुनिया वैसी ही थी। लोग चल रहे थे। गाड़ियाँ थीं। एक चायवाला ठेला लगाए था।

विक्रम को लगा — मैं अदृश्य हो गया हूँ।


[ दूसरा अध्याय — सिस्टम रीबूट की कोशिश ]

घर में पत्नी संगीता को बताया — “प्रोजेक्ट खत्म हुआ। कुछ दिन आराम करूँगा।”

झूठ।

बेटी रिया को बताया — “पापा घर पर काम करेंगे कुछ दिन।”

झूठ।

माँ को लखनऊ में फोन किया — “सब ठीक है अम्मा।”

झूठ।

और खुद से?

खुद से कहा — “दो हफ्ते में नई नौकरी मिल जाएगी। मेरा अनुभव है। मेरा नेटवर्क है।”

सबसे बड़ा झूठ।


पहले हफ्ते:

LinkedIn profile अपडेट की। “Open to Work” — नहीं लगाया। रुतबे का सवाल था।

पचास कनेक्शंस को संदेश भेजे।

जवाब आए — ग्यारह।

“देखता हूँ।” “बाज़ार slow है यार।” “AI की वजह से कंपनियाँ hiring freeze में हैं।” “तेरा profile strong है, ज़रूर कुछ निकलेगा।”


दूसरे हफ्ते:

नौकरी की वेबसाइटों पर खोज शुरू की।

जो पद मिले — या तो junior थे, या तनख्वाह आधी थी, या माँगते थे:

“5+ years experience in GenAI, LLM fine-tuning, RAG architecture, vector databases।”

विक्रम ने यह पढ़ा।

GenAI — वो जानते थे। LLM — surface level। RAG architecture — उन्होंने नाम सुना था। Vector databases — Pinecone? Weaviate? उन्होंने कभी production में इस्तेमाल नहीं किए थे।

पंद्रह साल का अनुभव। और अचानक लगा —

मैं पुराना हो गया हूँ।

यह डर — नौकरी जाने का डर नहीं था।

यह था — खुद के अप्रासंगिक हो जाने का डर।

मनोविज्ञान में इसे कहते हैं — Occupational Obsolescence Anxiety। वो घबराहट जो तब होती है जब इंसान को लगे कि उसका पूरा कौशल, पूरी पहचान — बाज़ार में बेकार हो गई।


तीसरे हफ्ते:

नींद टूटने लगी।

रात को तीन बजे आँख खुलती। और दिमाग़ — जो एक बेहतरीन तकनीकी दिमाग़ था — वो calculation करने लगता।

मुआवज़ा — उन्नीस लाख। छः महीने चलेगा। घर की किश्त — अड़तीस हज़ार। गाड़ी की किश्त — बाईस हज़ार। रिया की फीस — सत्रह हज़ार। माँ की दवाइयाँ — आठ हज़ार। घर का खर्च — पच्चीस हज़ार। कुल — एक लाख दस हज़ार प्रतिमाह।

छः महीने = अट्ठारह सप्ताह = एक सौ छब्बीस दिन।

दिमाग़ countdown कर रहा था।

जैसे किसी server पर disk space खत्म हो रहा हो — और कोई alert नहीं है।


चौथे हफ्ते:

विक्रम ने रात को लैपटॉप खोला।

GitHub खोला।

एक नया repository बनाया — “vikram-learning-2024”

और GenAI सीखना शुरू किया। Hugging Face के docs। LangChain tutorials। OpenAI API। Vector embeddings।

रात के दो बजे। तीन बजे। कभी-कभी चार बजे तक।

संगीता उठतीं — “सो जाओ।”

“बस थोड़ा काम है।”

काम नहीं था। डर था। डर को code में छुपा रहे थे।


[ तीसरा अध्याय — Emergency Protocol ]

दूसरे महीने के अंत में।

खाते में बचे थे — बारह लाख।

और एक सुबह — माँ का फोन आया।

“बेटा, डॉक्टर ने नया test बताया है। Angiography। खर्चा बताया है — तीन लाख।”

विक्रम ने फोन रखा।

बाथरूम में गए।

नल चलाया।

और पहली बार — रोए।

पानी की आवाज़ में। जहाँ कोई नहीं सुन सके।


उस रात — एक पुराने मित्र का संदेश आया। अनिल। जो अब एक छोटी कंपनी में था।

“यार, सुना है तू free है। एक काम है — part time। एक startup को cloud architecture review चाहिए। तीन महीने। डेढ़ लाख।”

विक्रम ने तुरंत हाँ किया।

डेढ़ लाख — जो कभी एक महीने की तनख्वाह का आधा था — आज किसी खज़ाने से कम नहीं लगा।

लेकिन—

डेढ़ लाख। तीन महीने में। और हर महीने का खर्च — एक लाख दस हज़ार।

गणित अभी भी नहीं बैठ रहा था।


तभी —

एक रात — YouTube पर एक वीडियो था।

एक अमेरिकी इंजीनियर। Google से निकाला गया। वो बता रहा था कि कैसे उसने Uber चलाई — रात को — परिवार को बताए बिना।

विक्रम ने वो वीडियो दो बार देखा।

तीसरी बार — उसने अपना फोन उठाया।

और ड्राइवर एप्लीकेशन डाउनलोड की।


पंजीकरण प्रक्रिया:

आधार कार्ड। ड्राइविंग लाइसेंस। गाड़ी के दस्तावेज़। पुलिस verification।

तीन दिन।

स्वीकृति मिली।

और विक्रम — जो कभी तीन सौ बीस हज़ार कमाते थे — एक ड्राइवर बन गए।

रात के।

अनजाना।


[ चौथा अध्याय — नाइट शिफ्ट ]

पहली रात।

संगीता सोईं — रात ग्यारह बजे।

विक्रम ने गाड़ी की चाबी उठाई। चुपचाप दरवाज़ा खोला। लिफ्ट नहीं ली — आवाज़ होती। सीढ़ियों से उतरे।

गाड़ी में बैठे। एप्लीकेशन खोली।

पहली सवारी — रात बारह बजे।

गंतव्य: कनॉट प्लेस।

सवारी एक लड़की थी। कॉल सेंटर से लौट रही थी। थकी हुई। ईयरफोन लगाए। कोई बात नहीं की।

विक्रम ने गाड़ी चलाई।

अठारह मिनट।

एक सौ छियासी रुपये।

लड़की उतरी। पाँच में से पाँच रेटिंग दी।

विक्रम ने वो rating देखी।

पाँच में से पाँच।

अजीब लगा। इतने सालों में — performance reviews में — कभी ऐसी सीधी, साफ, तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं मिली थी।

उन्होंने अगली सवारी स्वीकार की।


हफ्तों बाद — एक pattern बन गया।

दिन में: startup का cloud architecture काम। GenAI सीखना। नौकरियों में आवेदन।

रात में: गाड़ी चलाना। बारह से तीन बजे तक।

औसत रात की कमाई — छः सौ से नौ सौ रुपये।

महीने में — अठारह से पच्चीस हज़ार अतिरिक्त।

पर्याप्त नहीं था। लेकिन एक लाइफलाइन था।


लेकिन असली खतरा तकनीकी नहीं था।

असली खतरा था — पहचान का।

एक रात — एक सवारी आई। गंतव्य: इंदिरापुरम।

विक्रम ने accept किया।

सवार बैठे — और विक्रम ने आईने में देखा।

रमेश अग्रवाल।

उसी कंपनी में थे। दो साल पहले तक। एक दूसरे विभाग में।

विक्रम का दिल एक पल के लिए रुका।

उन्होंने टोपी नीचे खींची। मास्क — जो कभी-कभी पहनते थे — लगाया।

रमेश ने फोन में देखा। पूरा रास्ता।

उतरे। बिना देखे।

विक्रम ने लंबी साँस ली।

बचे।

लेकिन उस रात — घर आकर — लैपटॉप खोला और एप्लीकेशन की settings में जाकर सर्विस एरिया बदल दिया। अब सिर्फ वो इलाके — जहाँ कोई जानने वाला न हो।

एक तकनीकी इंसान का तकनीकी हल।


[ पाँचवाँ अध्याय — अयोध्या तक की सवारी ]

तीसरे महीने की एक रात।

रात के दस बजे — एप्लीकेशन पर एक असामान्य booking आई।

नोएडा से अयोध्या।

पाँच सौ किलोमीटर। रात भर की यात्रा। किराया — तीन हज़ार चार सौ।

विक्रम ने देखा।

यह एक रात की सबसे बड़ी कमाई होगी।

उन्होंने accept किया।


सवार एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति थे। सफेद कुर्ता। एक पुरानी झोला। और चेहरे पर — कोई urgency नहीं। कोई anxiety नहीं।

जो विक्रम के चेहरे पर हमेशा रहती थी।

गाड़ी चली।

शुरू में चुप्पी।

फिर वो बोले — हिंदी में, धीरे से — “रात को चलाते हो?”

“जी।”

“दिन में क्या करते हो?”

विक्रम ने एक पल रुककर कहा, “काम।”

वो हल्के से मुस्कुराए। “ठीक है।”


आगरा bypass के पास — रात के एक बजे — अचानक गाड़ी में एक अजीब आवाज़ आई।

थड़ — थड़ — थड़।

विक्रम ने तुरंत गाड़ी किनारे लगाई।

टायर पंक्चर।

हाईवे पर। रात के एक बजे। अँधेरे में।

वो उतरे। ट्रंक खोला। स्टेपनी निकाली। जैक लगाया।

वो सज्जन भी उतरे। बोले, “मैं पकड़ता हूँ।”

दोनों मिलकर टायर बदला।

पच्चीस मिनट।

पसीना। ठंडी हवा। हाईवे पर ट्रकों की रोशनी।

काम हो गया।

गाड़ी में वापस बैठे।

और वो सज्जन बोले — अचानक — “तुम IT में थे?”

विक्रम रुके।

“क्यों?”

“क्योंकि जिस तरह तुमने तुरंत diagnose किया — गाड़ी रोकी, ट्रंक खोला, sequence follow किया — यह किसी trained technical mind का काम है। Panic नहीं किया। Process follow किया।”

विक्रम ने कुछ नहीं कहा।

“और,” वो आगे बोले, “तुम्हारे फोन पर जब booking आई थी — मैंने देखा था — दो applications खुली थीं। एक यह। एक GitHub।”


गाड़ी फिर चली।

लंबी चुप्पी।

फिर विक्रम ने — खुद भी नहीं जानते क्यों — कहा:

“हाँ। IT में था। नौकरी गई।”

वो सज्जन ने कोई dramatic प्रतिक्रिया नहीं दी।

बस कहा, “कब से?”

“तीन महीने।”

“घर पर पता है?”

“नहीं।”

एक और चुप्पी।

“क्यों नहीं बताया?”

विक्रम ने जवाब देने की कोशिश की।

लेकिन जवाब नहीं आया।

क्योंकि जवाब था — मुझे डर है।

और यह शब्द — एक वरिष्ठ तकनीकी प्रबंधक के लिए — सबसे कठिन शब्द थे।


वो सज्जन बोले:

“मनोविज्ञान में एक concept है — Imposter Syndrome। जब सफल लोग अंदर से डरते हैं कि कोई पकड़ लेगा कि असल में वो उतने काबिल नहीं।”

“मैं जानता हूँ यह term।”

“तो तुम जानते हो कि तुम्हारे साथ क्या हो रहा है। तुम यह नहीं मान रहे कि नौकरी जाना तुम्हारी गलती नहीं थी। तुम इसे अपनी personal failure मान रहे हो। और इसलिए छुपा रहे हो।”

विक्रम का हाथ स्टीयरिंग पर कस गया।

“2023 से 2025 के बीच — पूरी दुनिया में — पाँच लाख से ज़्यादा IT jobs गई हैं। सिर्फ इसलिए नहीं कि लोग काबिल नहीं थे। बल्कि इसलिए कि technology का एक बड़ा shift आया।”

“यह मुझे पता है।”

“तो फिर खुद को दोष क्यों दे रहे हो?”


सरयू नदी दिखने लगी — भोर से पहले।

अयोध्या की रोशनियाँ।

वो सज्जन बोले:

“एक बात और। तुमने कहा GenAI सीख रहे हो।”

“हाँ।”

“LangChain, RAG — यह सब सीख रहे हो तो सुनो। यह tools हैं। और tools को चलाने के लिए एक चीज़ चाहिए — जो तुम्हारे पास है।”

“क्या?”

Judgment। Production में कब कौन सा tool fail होगा — यह एक जूनियर नहीं जानता। यह पंद्रह साल का अनुभव जानता है। AI tools को deploy करने वाला कोई भी कर सकता है। लेकिन जो सही decision ले — crisis में — वो तुम जैसे लोग करते हैं।”

“लेकिन कंपनियाँ—”

“कंपनियाँ अभी confused हैं। वो सोच रही हैं AI सब कर देगा। छः महीने में — एक साल में — उन्हें पता चलेगा कि AI-ops tools बिना experienced oversight के कितने dangerous हैं। तब वो ढूँढेंगे — तुम जैसे लोग। जो दोनों जानते हों।”


गाड़ी रुकी।

सरयू किनारे।

वो सज्जन उतरे। पैसे दिए। फिर रुककर बोले:

“एक आखिरी बात।”

“जी।”

“घर जाकर बताओ। संगीता को — या जो भी हो — बताओ। इसलिए नहीं कि वो solve करेगी। बल्कि इसलिए कि अकेले उठाया हुआ बोझ दोगुना भारी होता है। और तुम्हें अभी अपनी पूरी energy चाहिए — नई शुरुआत के लिए।”

विक्रम ने पूछा, “आप कौन हैं?”

वो मुस्कुराए।

“कोई नहीं। बस एक इंसान जो तीस साल पहले — तुम्हारी जगह था।”

और वो चले गए।

अयोध्या की गलियों में।


[ छठा अध्याय — System Restart ]

विक्रम सरयू किनारे गए।

भोर की पहली रोशनी।

ठंडा पानी।

और उन्होंने अपना फोन निकाला।

संगीता को call किया।

घंटी गई।

“हेलो? विक्रम? कहाँ हो? रात भर—”

“संगीता। सुनो।”

“क्या हुआ? आवाज़—”

“बस सुनो। मुझे कुछ बताना है।”


पाँच मिनट।

विक्रम ने सब कहा।

नौकरी। मुआवज़ा। रात की ड्राइविंग। माँ का खर्च। डर।

सब।

संगीता ने पूरा सुना।

बीच में एक शब्द नहीं।

फिर बोलीं — आवाज़ में कोई नाटक नहीं था। कोई रोना नहीं था।

बस एक सवाल:

“तुमने यह तीन महीने अकेले उठाया?”

“हाँ।”

“क्यों?”

“मुझे लगा—”

“तुम्हें लगा मैं समझ नहीं पाऊँगी। या कमज़ोर मानूँगी। या घबरा जाऊँगी।”

“हाँ।”

संगीता ने एक लंबी साँस ली।

“विक्रम। तुम उस आदमी की गाड़ी चला रहे थे जो रात को सोती थी। क्योंकि उसे लगता था तुम हो।”

यह वाक्य — एक तकनीकी इंसान के सारे calculations से ज़्यादा powerful था।


[ अंतिम अध्याय — नई Architecture ]

दो महीने बाद।

विक्रम ने एक नया GitHub repository बनाया।

नाम: “vikram-genai-infra”

उसमें था — एक पूरा framework। जो पारंपरिक cloud infrastructure को AI-ops tools के साथ integrate करता था। Real-world production scenarios। Failure cases। Recovery protocols।

वो चीज़ें जो कोई GenAI tutorial नहीं सिखाता। जो सिर्फ पंद्रह साल का अनुभव सिखाता है।

उस repository को — तीन हफ्ते में — चार सौ stars मिले।

एक startup के founder ने message किया:

“Are you open to a conversation? We need someone who understands both — legacy systems and AI-native architecture. Your repo is exactly the gap we’re trying to fill.”


तनख्वाह — पहले से कम थी।

नौकरी — छोटी कंपनी थी।

पद का नाम — पहले जितना impressive नहीं था।

लेकिन—

रात को नींद आती थी।

संगीता को पता था।

माँ को पता था।

और एक रात — रिया ने — जो दस साल की थी — पूछा:

“पापा, आपने GitHub पर कुछ डाला है। मेरी दोस्त के भाई ने बताया — वो programming सीखता है।”

विक्रम ने हँसकर उसे गोद में बैठाया।

“हाँ बेटा।”

“उसमें क्या है?”

“उसमें है — वो सब जो पापा ने गलतियों से सीखा।”

रिया ने सिर उनके कंधे पर रखा।

“तो वो important होगा। गलतियों वाली चीज़ें हमेशा important होती हैं।”


— समाप्त —


IT की दुनिया में एक शब्द है — Redundancy। इसका मतलब होता है — backup system। जो तब काम आता है जब main system fail हो।

इंसान की ज़िंदगी में भी redundancy होती है। वो होती है — वो लोग जिन्हें हम सच बताते हैं।

जो हमें deprecated नहीं होने देते। जो हमें restart करते हैं। जब हम खुद नहीं कर पाते।


और अगर तुम अभी उस लिफ्ट में हो — जो ऊपर-नीचे हो रही है — तो जानो:

यह crash नहीं है। यह reboot है।

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