— एक माँ की आत्मा की यात्रा, मूर्ति से मनुष्य तक — प्रारम्भ · भोर से पहले हर घर में एक स्त्री होती है जो अँधेरे से पहले उठती है। इससे पहले कि सूरज याद करे कि उसे उगना है — वह उठ जाती है। चूल्हा जलाती है। पानी रखती है। आटा गूँधती है। मंदिर …

Joan Robins
Joan Robins

I set up this blog to share interior design, travel and lifestyle inspiration for simple, relaxed living at home and beyond. You’ll find home tours, advice and tips, interviews, reviews, postcards from places I love and more – always with a focus on minimalism, muted colours and timeless, considered design.

Share:

— एक माँ की आत्मा की यात्रा, मूर्ति से मनुष्य तक —

प्रारम्भ · भोर से पहले

हर घर में एक स्त्री होती है जो अँधेरे से पहले उठती है।

इससे पहले कि सूरज याद करे कि उसे उगना है — वह उठ जाती है। चूल्हा जलाती है। पानी रखती है। आटा गूँधती है। मंदिर में दीपक जलाती है। और जब तक घर के बाकी लोग आँखें मलते हुए बाहर आते हैं, उसका पूरा एक जीवन बीत चुका होता है — बिना किसी के देखे।

उसका नाम था — सरस्वती। पर घर में सब उसे “माँ” कहते थे। बेटा “माँ” कहता था, पति “अरे सुनो” कहते थे, पड़ोसन “भाभीजी” कहती थी। उसका अपना नाम — वह कब का घर की दहलीज़ पर छूट गया था। किसी को याद भी नहीं था।

· · ·

भाग एक · मूर्ति बनने की प्रक्रिया

सरस्वती की शादी हुई थी बाईस साल की उम्र में। वाराणसी के एक सरकारी कर्मचारी से। अच्छा घर था। सास ने कहा था — “बहू, यहाँ लक्ष्मी आई है।” और सरस्वती ने मान लिया कि लक्ष्मी का काम यही होता है — देना, देना, और देना। माँगना नहीं।

उसने कभी नहीं कहा कि उसे गाना सीखना था। कि पिताजी ने कहा था — “सरस्वती की आवाज़ में राग भैरवी उतर आती है।” कि शादी के बाद उसने तानपुरे को कपड़े में लपेट कर एक कोने में रख दिया था और वह कपड़ा अब धूल से भारी हो गया था।

उसने कभी शिकायत नहीं की। इसलिए नहीं कि उसे कष्ट नहीं था। बल्कि इसलिए — क्योंकि उसे यही बताया गया था कि अच्छी माँ, अच्छी बहू, अच्छी पत्नी — वह होती है जिसे कष्ट होता ही नहीं। या जो कष्ट को परमेश्वर की इच्छा मानकर पी जाती है।

वर्षों बीतते गए। बेटा बड़ा हुआ। Bangalore गया। Engineer बना। माँ को video call पर देखता था — हर बार माँ मुस्कुराती थी। हर बार “सब ठीक है” कहती थी। बेटे ने भी मान लिया — माँ ठीक है।

पति रिटायर हुए। घर में रहने लगे। अब सरस्वती का समय और कम हो गया — क्योंकि पति को चाय चाहिए, अखबार चाहिए, दोपहर को गरम खाना चाहिए। सरस्वती ने दिया। हमेशा दिया।

साहित्य में जैसी माँ होती है — वैसी ही वह बन गई थी। मूर्ति। देवी। पर देवी के भीतर एक स्त्री थी जो धीरे-धीरे साँस लेना भूलती जा रही थी।

· · ·

भाग दो · वह रात जब दरवाज़ा खुला

उस रात बिजली चली गई थी।

घर में सब सो गए थे। सरस्वती अकेली रसोई में बैठी थी। मोमबत्ती जल रही थी। और न जाने क्यों — उसके हाथ उठे। अंधेरे में उसने उस कोने की तरफ बढ़े जहाँ तानपुरा रखा था।

कपड़ा उठाया। धूल झड़ी। और उसने — पहली बार पच्चीस साल में — तार छुआ।

एक स्वर निकला। कच्चा। थरथराता हुआ। जैसे किसी ने बहुत दिनों से बंद कमरे का दरवाज़ा खोला हो।

वह रोई नहीं। रोने के लिए भी आवाज़ चाहिए होती है — और उसने वह भी भूला दी थी। वह बस बैठी रही। तार को पकड़े। जैसे किसी खोई हुई बच्ची का हाथ मिल गया हो। वह बच्ची — जो वह खुद थी। बाईस साल पहले।

· · ·

भाग तीन · जब परमेश्वर ने उत्तर दिया

अगले दिन पड़ोस की वृद्धा कमला दीदी आईं। नब्बे साल की थीं। पर आँखों में वह ज्योति थी जो कई युवाओं में नहीं होती।

उन्होंने सरस्वती की आँखें देखीं — और बिना कुछ पूछे कहा, “बेटी, भगवान ने स्त्री को सृष्टि बनाई — सिर्फ सेवा करने के लिए नहीं। सृष्टि रचने के लिए।”

सरस्वती ने पूछा, “दीदी, पर शास्त्र तो कहते हैं—”

कमला दीदी ने बात काटी — “शास्त्र यह भी कहते हैं।”

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥

— मनुस्मृति · ३.५६

“जहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है — वहाँ देवता निवास करते हैं। और सम्मान का अर्थ है — उनकी आत्मा को जीने देना। उनके सपनों को मरने न देना।”

कमला दीदी ने आगे कहा — “बेटी, त्याग और आत्महत्या में फर्क होता है। त्याग वह है जो तुम चेतना से करो — अपनी शक्ति से। आत्महत्या वह है जब तुम अपने भीतर की जीवित स्त्री को रोज़ थोड़ा-थोड़ा मारती रहो।”

सरस्वती के भीतर कुछ टूटा। पर वह टूटना — वह आज़ादी की तरह था। जैसे वर्षों से बंद एक घड़े का ढक्कन उठा। और भीतर से हवा नहीं — प्रकाश निकला।

· · ·

भाग चार · माँ का पुनर्जन्म

उस शाम सरस्वती ने पति से कहा — शांत आवाज़ में, पर दृढ़ता से — “कल से मैं सुबह एक घंटा अपने लिए रखूँगी।”

पति ने अखबार से ऊपर देखा। उनके चेहरे पर आश्चर्य था। सरस्वती ने उनकी आँखों में देखा — और मुस्कुराई। पहली बार वह मुस्कान — किसी के लिए नहीं थी। खुद के लिए थी।

अगले दिन भोर में, जब सबसे पहले उठी — उसने पहले चूल्हा नहीं जलाया। पहले तानपुरा उठाया।

राग भैरवी — भोर का राग। उदासी और आशा का राग। उसने गाया। धीरे-धीरे। काँपते हुए। गले में दशकों की जंग थी। पर स्वर था — क्योंकि स्वर मरता नहीं। वह बस प्रतीक्षा करता है।

रसोई में देर हुई उस दिन। चाय थोड़ी late बनी। पर उस दिन की चाय — पति ने कहा — “आज चाय अलग लगी।” सरस्वती मुस्कुराई। उन्हें नहीं पता था — चाय वही थी। बनाने वाली बदल गई थी।

· · ·

भाग पाँच · जब बेटे ने सुना

तीन महीने बाद बेटा Diwali पर घर आया। रात को जब सब सो गए, उसने माँ को तानपुरे के पास बैठे देखा। उसने पूछा, “माँ, यह कब से?”

सरस्वती ने कहा — “पच्चीस साल बाद।”

बेटे की आँखें भर आईं। उसने पूछा, “माँ, तुमने इतने साल क्यों नहीं बताया?”

सरस्वती ने तार पर उँगली रखी और धीरे से कहा — “क्योंकि मुझे लगता था — माँ को कुछ चाहिए नहीं होता। माँ सिर्फ देती है।”

“पर बेटा — यह सच नहीं है। माँ भी एक मनुष्य है। और मनुष्य को — जीने के लिए — सिर्फ रोटी नहीं चाहिए। उसे अपनी आत्मा की आवाज़ भी चाहिए।”

बेटा उस रात माँ के पास बैठा रहा। माँ गाती रही। और वह सुनता रहा। शायद पहली बार — उसने माँ को माँ की तरह नहीं देखा। उसने एक स्त्री को देखा। एक जीवित, साँस लेती, महसूस करती, सपने देखती स्त्री को।

वह रात — उन दोनों के जीवन में — एक नई शुरुआत थी।

· · ·

भाग छह · देवी नहीं — देवता की रचना

हमारे शास्त्रों में एक बात है जो हम भूल गए हैं।

सरस्वती — वह देवी जिनका नाम इस स्त्री ने ढोया — वह मौन नहीं बैठतीं। वह वीणा बजाती हैं। वह विद्या देती हैं। वह बोलती हैं। वह सृजन करती हैं।

दुर्गा युद्ध करती हैं। काली क्रोध में भी सत्य हैं। राधा प्रेम में पूर्ण स्वतंत्र हैं — वह कृष्ण की पत्नी नहीं थीं, पर उनकी सबसे बड़ी शक्ति थीं।

शक्तिः शक्तिमतां चाहं कामोऽस्मि भरतर्षभ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥

— श्रीमद् भगवद्गीता · ७.११

शक्ति में शक्ति मैं हूँ — कृष्ण ने कहा। अर्थात् जब कोई स्त्री अपनी शक्ति में होती है — वह ईश्वर की अभिव्यक्ति है। जब वह अपनी शक्ति को दबाती है — वह ईश्वर की अभिव्यक्ति को दबाती है।

हर घर जहाँ माँ की आत्मा मरती है — वह घर नहीं, वह देवताओं का अपमान है। और हर घर जहाँ माँ को जीने दिया जाता है — वहाँ लक्ष्मी सिर्फ तस्वीर में नहीं, साँसों में होती है।

· · ·

भाग सात · एक आह्वान — हर बेटे से, हर पति से

यह कहानी सरस्वती की है। पर यह कहानी हर घर में है।

तुम्हारी माँ के पास भी कोई धुन है जो गाई नहीं गई। तुम्हारी पत्नी के पास भी कोई सपना है जो कभी पूछा नहीं गया। तुम्हारी बेटी के पास भी कोई आग है — जिसे “लड़की है” कहकर बुझाया जाता है।

आज — अभी — एक काम करो।

माँ से पूछो — “माँ, तुम्हें क्या पसंद है?” पत्नी से पूछो — “तुम्हारा कोई सपना था जो रह गया?” बेटी से पूछो — “तू क्या बनना चाहती है — सच में?”

और जो उत्तर आए — उसे सुनो। सिर्फ सुनो। ठीक करने की कोशिश मत करो। सुनो।

यही त्याग है। यही सच्चा धर्म है। परिवार का अर्थ यही है — जहाँ हर आत्मा को — बेटे की भी, माँ की भी — जीने की जगह मिले।

सरस्वती आज भी भोर में उठती है। पर अब वह पहले तानपुरा उठाती है। फिर चूल्हा। और घर में जो संगीत है — वह सिर्फ कानों को नहीं, दीवारों को भी सुनाई देता है।

पड़ोसी कहते हैं — “उस घर में कुछ बदल गया है।” बेटा कहता है — “माँ बदल गई है।” पति कहते हैं — “घर बदल गया है।”

सच यह है — कुछ बदला नहीं। सरस्वती वही है। बस अब वह सिर्फ मूर्ति नहीं — वह मनुष्य है। और मनुष्य होना — ईश्वर का सबसे बड़ा वरदान है।

जो माँ चुप है — उससे पूछो।
जो बेटी दबी है — उसे सुनो।
जो स्त्री थकी है — उसे देखो।

देवी वह नहीं जो पत्थर की हो।
देवी वह है जो जीती हो — पूरी तरह, अपने नाम से।

Be the first to read my stories

Join a Journey Within.. Receive soulful stories..

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Stay Updated With Us
Subscribe to our newsletter for latest updates
    SUBSCRIBE
    I agree with the term and condition