नई कार, पुरानी गलती . वृंदावन ने सब बदल दिया वृन्दावन में मिला सबक जो कोई showroom नहीं देता Rajeev Malhotra ने जिस रात नई कार की delivery ली थी, उस रात वो सो नहीं पाए थे। खुशी से नहीं — बल्कि एक अजीब-सी बेचैनी से। Showroom से निकलते वक्त जो excitement थी, वो घर …

Joan Robins
Joan Robins

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नई कार, पुरानी गलती . वृंदावन ने सब बदल दिया

वृन्दावन में मिला सबक जो कोई showroom नहीं देता

Rajeev Malhotra ने जिस रात नई कार की delivery ली थी, उस रात वो सो नहीं पाए थे।

खुशी से नहीं — बल्कि एक अजीब-सी बेचैनी से। Showroom से निकलते वक्त जो excitement थी, वो घर पहुँचते-पहुँचते कहीं पिघल गई थी। Driveway में खड़ी चमचमाती Creta को देखकर पत्नी Sunita खुश थीं। बेटे Aryan ने selfie ली थी। बेटी Rhea ने sunroof से झाँककर चिल्लाया था — “Papa, yeh toh amazing hai!”

पर Rajeev के मन में एक calculator चल रहा था। बंद नहीं हो रहा था।

नौ लाख down payment। पाँच साल की EMI — तिरपन हज़ार रुपये महीना। Insurance। Maintenance। Fuel। Parking। और वो पुरानी Wagon R जो उन्होंने trade-in में दे दी थी — जो कभी उनके साथ Manali गई थी, Goa गई थी, जिसमें Aryan पैदा होने के बाद पहली बार hospital से घर आया था।

उस रात Rajeev की नींद उड़ गई थी।

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तीन महीने बाद, जब office का pressure और EMI की tension मिलकर घुटन बनने लगी, तो Sunita ने कहा था — “कहीं चलते हैं। बस तीन दिन।”

Rajeev ने कहा, “Vrindavan चलते हैं। माँ हमेशा कहती थीं।”

और यूँ, एक शुक्रवार की सुबह, वो चारों — Rajeev, Sunita, सोलह साल का Aryan, और तेरह साल की Rhea — नई Creta में बैठकर Delhi से निकल पड़े।

कार smooth थी। AC perfect था। Music system अच्छा था। पर Rajeev का मन Yamuna Expressway पर नहीं था — वो EMI के spreadsheet पर था।

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Vrindavan पहुँचते ही कुछ हुआ। वो “कुछ” जो शब्दों में नहीं आता।

गाड़ी parking में लगाई। और जैसे ही वो चारों उन संकरी गलियों में घुसे — फूलों की महक, घंटियों की आवाज़, तुलसी की गंध — कुछ ढीला पड़ने लगा। जैसे कसी हुई मुट्ठी खुलने लगी हो।

Banke Bihari मंदिर के बाहर एक बुज़ुर्ग बैठे थे — धोती, gamcha कंधे पर, एक पुरानी cycle उनके पास खड़ी थी जिसपर एक टोकरी बंधी थी, जिसमें माला और प्रसाद था। नाम था उनका Nandkishore Baba। उम्र कोई पचहत्तर साल।

Aryan ने cycle देखकर हल्के से हँसते हुए कहा, “Papa, यह cycle देखो — कितनी पुरानी होगी!”

Nandkishore Baba ने सुन लिया। मुस्कुराए और बोले, “बेटा, यह cycle पैंतीस साल पुरानी है। और अभी तक साथ है। तेरी नई गाड़ी कितने साल चलेगी?”

Aryan थोड़ा असहज हो गया। Rajeev ने Baba की तरफ देखा।

Baba ने कहा, “बैठो। थोड़ी देर।”

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वो पाँचों मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गए। Baba ने पूछा, “कहाँ से आए?”

“Delhi से।”

“क्या करते हो?”

Rajeev ने बताया — IT company में manager थे। Sunita school में teacher थीं।

Baba ने पूछा, “खुश हो?”

सवाल सीधा था। जवाब अटका।

Rajeev ने कहा, “जी, हाँ… मतलब, ठीक है सब।”

Baba मुस्कुराए। बोले, “ठीक है — यह खुशी नहीं होती। ठीक है — यह थका हुआ इंसान का जवाब होता है।”

Rajeev को नहीं पता था क्यों, पर उस एक लाइन ने उन्हें अंदर से हिला दिया।

Baba ने पूछा, “यह नई गाड़ी लाए? EMI पर?”

“जी।”

“कितनी?”

Rajeev ने बताया — तिरपन हज़ार। पाँच साल।

Baba ने एक पल आँखें बंद कीं। फिर बोले:

“बेटा, हमारे यहाँ एक कहावत है — ‘जो बैल दूसरे के खेत के लिए हल चलाए, वो खुद भूखा रहे।’

“तुम हर महीने तिरपन हज़ार रुपये कमाते नहीं हो — उस EMI के लिए कमाते हो। वो पैसा तुम्हारा है ही नहीं। तुम उस कार के लिए काम कर रहे हो — कार तुम्हारे लिए नहीं।”

Sunita ने Rajeev की तरफ देखा। Rajeev चुप थे।

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Baba आगे बोले। उनकी आवाज़ में कोई lecture नहीं था — बस एक पुरानी, थकी-हुई, समझदार आवाज़ थी।

“मेरे पास यह cycle है। मैंने इसे तीन सौ रुपये में खरीदा था — second hand। इसके बाद से आज तक, मैंने हर Ekadashi पर Govardhan की परिक्रमा इसी पर की है। यह कभी नहीं रुकी।”

Aryan ने पूछा, “Baba, नई cycle नहीं लेते? अब तो electric भी आती है।”

Baba हँसे। बोले, “लेने की ज़रूरत क्यों? यह चलती है। और जब यह चलती है, तो मेरा मन उस रास्ते पर रहता है — कान्हा के दर्शन पर। नई चीज़ लो तो मन उसी चीज़ पर रहता है — उसकी देखभाल पर, उसकी चिंता पर।”

Rhea ने धीरे से कहा, “Papa, यह तो सच है। आप हमेशा कार की tension में रहते हो — scratch हो जाएगी, parking नहीं मिलेगी…”

Rajeev ने बेटी को देखा। बच्ची ने वो देख लिया था जो वो खुद नहीं देख पाए थे।

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शाम को Yamuna के घाट पर बैठे थे सब। वहाँ एक और आदमी मिले — Giriraj Prasad। पुजारी थे। छोटा-सा घर था उनका, घाट के पास। पुरानी दीवारें, पर साफ। एक पुराना scooter था — Bajaj Chetak — जिसकी उम्र वो खुद भी ठीक से नहीं जानते थे।

Rajeev ने पूछा, “Panditji, आपका यह पुराना scooter — कभी नई bike लेने का मन नहीं हुआ?”

Panditji ने जवाब दिया जो Rajeev ने अपनी diary में उसी रात लिख लिया:

“भाई साहब, नई चीज़ लेना तो एक दिन की खुशी है। पर उसके बाद जो बोझ आता है — वो पाँच साल का होता है। मेरा Chetak मुझे कहीं नहीं छोड़ता। मैं उसे कहीं नहीं छोड़ता। यह रिश्ता है। EMI नहीं।”

Sunita ने पूछा, “पर Panditji, लोग तो कहते हैं — पुरानी गाड़ी में खर्चा ज़्यादा होता है।”

Panditji मुस्कुराए। बोले, “हाँ, कभी-कभी repair करवाता हूँ। पाँच सौ, एक हज़ार। पर उस repair में मैं जानता हूँ क्या हो रहा है। EMI में? हर महीने पैसा जाता है — और मुझे पता भी नहीं होता कहाँ।”

उन्होंने आगे कहा, “और देखो — मेरे पास scooter repair का खर्च है। तुम्हारे पास कार का EMI है। मेरा खर्च मेरी मर्ज़ी से है। तुम्हारा खर्च bank की मर्ज़ी से।”

— ❧ —

रात को वो चारों एक छोटे-से dhaba में बैठे थे। Dal, roti, sabzi। कोई fancy restaurant नहीं था — पर खाना ऐसा था जैसे माँ ने बनाया हो।

Aryan ने कहा, “Papa, यह खाना हमारे घर के पास वाले उस mall के restaurant से अच्छा है।”

Rajeev ने कहा, “हाँ। और वहाँ एक plate का bill आता था जितने में यहाँ चारों का खाना हो गया।”

Sunita ने कहा, “यह वृन्दावन कर देता है — हिसाब साफ़।”

Rajeev ने पूछा, “मतलब?”

Sunita बोलीं, “मतलब — यहाँ आकर पता चलता है कि हम जो खर्च करते हैं, उसमें से कितना ज़रूरी है और कितना दिखावे के लिए।”

Aryan ने phone रख दिया। Rhea ने यमुना की तरफ देखा। एक पल के लिए — बस एक पल के लिए — वो चारों चुप हो गए। और वो चुप्पी अच्छी थी।

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अगले दिन वो Nandkishore Baba से फिर मिले। घाट पर। Baba चाय पी रहे थे — मिट्टी के kulhad में।

Rajeev बैठ गए और बोले, “Baba, मैं रात भर सोचता रहा।”

“क्या सोचा?”

“कि हमने पिछले पाँच साल में इतनी चीज़ें खरीदीं — नई कार, बड़ा TV, नया fridge, नया sofa — और हर बार खरीदते वक्त लगा कि अब खुश होंगे। पर हर बार थोड़े दिन बाद वो excitement चली गई। और EMI रह गई।”

Baba ने kulhad ज़मीन पर रखा। बोले:

“बेटा, हमारे ब्रज में कहते हैं — ‘भूखे को खाना चाहिए, लालची को तो दुनिया भर का खाना भी कम पड़े।’

“तुम भूखे नहीं थे। तुम्हारे पास Wagon R थी — चलती थी, काम करती थी। फिर भी नई ली। यह ज़रूरत नहीं थी। यह वो भूख थी जो advertisers ने लगाई।”

“जब तक यह भूख नहीं जाएगी, कोई भी नई चीज़ पुरानी हो जाएगी — और फिर और नई चाहिए होगी। यह चक्र है। EMI का नहीं — मन का।”

Sunita की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, “Baba, हमने Aryan के लिए ₹80,000 का gaming setup लिया था — उसने कहा था उसे ज़रूरत है study के लिए। दो महीने में वो धूल खा रहा है।”

Aryan ने सिर झुका लिया।

Baba ने Aryan से कहा, “बेटा, बुरा मत मान। यह तेरी गलती नहीं। तुझे बताया नहीं गया। आज जान लो — हर चीज़ जो तुम खरीदते हो, पहले यह पूछो: ‘क्या यह मेरी ज़िन्दगी बेहतर करेगी, या बस मेरी इच्छा पूरी करेगी?’ दोनों एक नहीं हैं।”

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तीसरे दिन, वापसी से पहले, वो चारों Govardhan गए। परिक्रमा का रास्ता था — सात कोस। Rajeev ने सोचा था बस थोड़ा देखेंगे। पर कुछ ऐसा हुआ कि वो पूरी परिक्रमा पर चल पड़े।

रास्ते में एक परिवार मिला। पाँच लोग थे — माँ-बाप और तीन बच्चे। साथ में एक पुरानी Maruti 800 थी, जो रास्ते के किनारे खड़ी थी। कार पर एक sticker था: “Paid in full — no EMI.”

Rajeev रुक गए। उस आदमी से बात की। नाम था Suresh — Lucknow से आए थे। Teacher थे।

Suresh ने बताया, “यह 2008 की Maruti 800 है। Second hand ली थी। डेढ़ लाख में। कभी EMI नहीं लिया। हर साल Vrindavan आते हैं — इसी में। और क्योंकि कोई loan नहीं है, इसलिए ऐसे trips हो पाती हैं।”

Rajeev ने अपनी Creta की तरफ देखा — जो parking में खड़ी थी। ₹13 लाख की। जिसके लिए वो अगले पाँच साल काम करेंगे।

और Suresh की ₹1.5 लाख की Maruti 800, जिसमें यह परिवार हर साल Vrindavan आता था — free।

Rajeev को पहली बार समझ आया कि freedom और EMI एक साथ नहीं रह सकते।

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वापसी पर Creta में बैठे सब। AC on था। Music system on था।

पर इस बार Rajeev ने music बंद करवाया। बोले, “बात करते हैं।”

Sunita ने कहा, “क्या सोच रहे हो?”

Rajeev ने कहा, “कि जब यह EMI खत्म हो — पाँच साल बाद — हम कोई नई EMI नहीं लेंगे। यह कार चलती रहेगी। और जो पैसा बचेगा — उससे हम ऐसे trips करेंगे। हर साल।”

Aryan ने कहा, “और मेरा अगला laptop — मैं बचाकर लूँगा।”

Rhea बोली, “Papa, मुझे नई cycle चाहिए थी। पर शायद अभी नहीं।”

Sunita की आँखें भर आईं। उन्होंने Rajeev का हाथ थाम लिया।

Rajeev ने कहा, “वृन्दावन ने कुछ नहीं दिया हमें।”

Sunita ने पूछा, “मतलब?”

“मतलब — उसने कुछ छीना। वो illusion छीना कि ज़्यादा चीज़ें = ज़्यादा खुशी। और जब illusion जाता है, तभी असली ज़िन्दगी शुरू होती है।”

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Delhi के आते-आते रात हो गई थी। Rhea सो गई थी। Aryan headphones लगाए था — पर music नहीं था, वो बस आँखें बंद किए था।

Rajeev ने highway पर एक पल के लिए रोड की रोशनी में सामने देखा।

उन्हें Nandkishore Baba की वो cycle याद आई — पैंतीस साल पुरानी, बिना किसी EMI के, बिना किसी showroom की चमक के। और फिर भी उस cycle ने Baba को हर Ekadashi पर Govardhan पहुँचाया था। बिना रुके।

Rajeev ने सोचा — असली reliability यही है। वो नहीं जो showroom में चमकती है। वो जो ज़िन्दगी के साथ चले।

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