ब्रज की माटी, एक शहरी लड़की, और ज़िन्दगी का सबक Priya Sharma की उम्र थी बत्तीस साल। Bangalore की एक बड़ी IT company में Senior Analyst थी। हर महीने एक लाख बीस हज़ार रुपये account में आते थे। फ्लैट खुद का था, car खुद की थी, और फिर भी — रात को सोते वक्त एक …
ब्रज की माटी, एक शहरी लड़की, और ज़िन्दगी का सबक
Priya Sharma की उम्र थी बत्तीस साल।
Bangalore की एक बड़ी IT company में Senior Analyst थी। हर महीने एक लाख बीस हज़ार रुपये account में आते थे। फ्लैट खुद का था, car खुद की थी, और फिर भी — रात को सोते वक्त एक अजीब-सा खालीपन था, जो छाती के बीचों-बीच बैठा रहता था। जैसे कोई पत्थर हो।
वो introvert थी — इतनी कि office की canteen में अकेले बैठती थी। Overthinker इतनी कि एक simple WhatsApp message भेजने से पहले उसे तीन बार edit करती थी। Anxious इतनी कि Sunday की रात को Monday का डर लग जाता था। और insecure इतनी — कि अपने mirror में झाँकना उसे अच्छा नहीं लगता था।
हर कोई जब कुछ कहता, वो हाँ कह देती थी। Boss ने overtime माँगा — हाँ। Friend ने last minute plan बनाया — हाँ। Colleague ने उसका credit ले लिया — चुप। उसके “हाँ” के पीछे कोई हाँ नहीं थी, बस एक डर था — कि “ना” कहने से लोग छोड़ देंगे।
ज़िन्दगी का कोई मक़सद नहीं था उसे। बस एक दिन के बाद दूसरा दिन था।
“भगवान पर भरोसा नहीं था। खुद पर तो बिल्कुल नहीं।”
उस साल दिसंबर में उसकी नानी का देहांत हुआ। नानी Mathura के पास एक छोटे से गाँव में रहती थीं। नानी की अंतिम इच्छा थी कि उनकी अस्थियाँ Vrindavan की Yamuna में विसर्जित हों। Priya के घर में और कोई नहीं था — माँ-पापा Pune में थे, travel नहीं कर सकते थे। तो यह काम Priya के हिस्से आया।
वो गई तो थी बस दो दिन के लिए। Train में सारा रास्ता headphones लगाए, आँखें बंद किए। मन में एक ही डर था — “अकेले यह सब कैसे करूँगी?”
Mathura station पर उतरी। Auto-rickshaw में बैठी। और जैसे-जैसे Vrindavan की गलियाँ नज़दीक आने लगीं, कुछ अजीब हुआ। हवा बदल गई। या शायद उसकी साँसें।
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अस्थि-विसर्जन के बाद Priya Yamuna के किनारे बैठी रही। घाट पर बड़ी भीड़ नहीं थी। दोपहर का वक़्त था। पास में एक पुराना पीपल का पेड़ था, उसकी छाँव में तीन-चार बुज़ुर्ग औरतें बैठी थीं। गाढ़े रंग की साड़ियाँ। माथे पर बड़ी-बड़ी बिंदियाँ। हाथों में माला।
उनमें से एक — जिनका नाम था Kanhiya Bua — उन्होंने Priya को देखा और बोलीं, “बेटा, तू रो तो नहीं रही, पर तेरी आँखें रो रही हैं।”
Priya चौंकी। उसे लगा शायद नानी की बात हो रही है। उसने हल्के से कहा, “नानी थीं, आज विसर्जन था।”
Kanhiya Bua बोलीं, “नानी तो गईं अपने घर। तू किसकी याद में रो रही है?”
Priya के पास जवाब नहीं था।
और शायद उस दिन, उस एक सवाल ने, उसकी सात साल की थकान को तोड़ दिया।
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कहानी कैसे शुरू हुई, Priya को नहीं पता। शायद उस घाट की मिट्टी में कुछ था। शायद यमुना की आवाज़ में। वो उन औरतों के पास बैठ गई। और बोलने लगी।
उसने बताया — job का pressure, लोगों को “ना” न कह पाना, रात को नींद न आना, यह डर कि वो काफी नहीं है, यह अहसास कि ज़िन्दगी बस गुज़र रही है, कट नहीं रही।
औरतें सुनती रहीं। बिना टोके। बिना फ़ोन उठाए।
फिर Radha Dadi — जो सबसे बुज़ुर्ग थीं — बोलीं एक बात, जो Priya को अब तक याद है:
“बेटा, हमारे यहाँ एक कहावत है — ‘जो गाय हर किसी को दूध देती है, उसे हर कोई दुहता है।’ तू गाय बनी रही है। थक गई ना?”
Priya हँसी। पहली बार उस दिन। पर हँसी में आँसू भी थे।
Radha Dadi ने आगे कहा, “यमुना देखती है ना, कैसे बहती है? कोई रोके — नहीं रुकती। कोई गंदगी डाले — वो अपना काम करती रहती है। बहना उसका स्वभाव है, और वो उससे नहीं हटती। तेरा स्वभाव क्या है बेटा? तुझे पता भी है?”
Priya चुप हो गई।
तीसरी औरत थीं — Meera Chachi। वो कम बोलती थीं, पर जब बोलती थीं, तो जैसे पत्थर पर लकीर हो जाती थी।
उन्होंने पूछा, “तू भगवान से डरती है क्या?”
Priya ने कहा, “मुझे भगवान पर भरोसा नहीं है।”
Meera Chachi मुस्कुराईं। बोलीं, “कान्हा को देखा है? वो खुद माखन चुराते थे। झूठ बोलते थे। नटखट थे। और फिर भी सारा ब्रज उनपर जान देता था। जानती है क्यों? क्योंकि वो खुद थे। बिल्कुल खुद। उन्होंने कभी नहीं सोचा कि लोग क्या कहेंगे।”
उन्होंने Priya की आँखों में देखकर कहा, “तू भगवान से नहीं डरती। तू खुद से डरती है।”
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धीरे-धीरे शाम होने लगी। घाट पर दीये जलने लगे। Kanhiya Bua ने Priya को एक लोककथा सुनाई —
“एक बार एक चिड़िया थी। बहुत सुंदर थी, पर उसने पंख बाँध रखे थे — इसलिए नहीं कि उड़ नहीं सकती थी, बल्कि इसलिए कि उसे डर था कि अगर उड़ी, तो कोई उसे देखेगा और वो उसे पसंद नहीं करेगा।”
“एक दिन जंगल में आग लगी। सब उड़े। वो भी उड़ी — मजबूरी में। और तब पता चला — उसके पंख सबसे बड़े थे। वो सबसे ऊँचा उड़ी।”
“बेटा, तू वो चिड़िया है। पंख हैं तेरे पास। बस डर ने बाँध रखे हैं।”
Priya की आँखें भर आईं। उसने कभी नहीं सोचा था कि एक अनपढ़ बुज़ुर्ग औरत उसे वो बात समझा देगी जो तीन साल की therapy नहीं समझा पाई।
Radha Dadi ने फिर कहा, “हमारे यहाँ कहते हैं — ‘कुम्हार जब मिट्टी को दबाता है, तब घड़ा बनता है।’ दबाव बुरा नहीं होता। दबाव बताता है कि तू कितनी मज़बूत है। पर कुम्हार खुद ज़मीन पर बैठा रहता है — वो घड़े को ज़मीन पर पटक नहीं देता। तू जब भी pressure में आती है, खुद को पटक देती है। यही ग़लत है।”
Meera Chachi ने जोड़ा, “और यह ‘हाँ-हाँ’ की आदत छोड़। हमारे गाँव में एक कहावत है — ‘जो हर बात में हाँ करे, वो न घर का न घाट का।’ तू अपनी ज़िन्दगी का घड़ा हाँ-हाँ करके तोड़ रही है।”
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रात होने लगी। Priya को जाना था। Hotel में booking थी। पर वो उठ नहीं पा रही थी।
उसने Kanhiya Bua से पूछा, “Bua, आप लोग इतनी कम में इतनी खुश कैसे हो?”
Bua ने हँसते हुए कहा, “कम? हमारे पास कान्हा हैं! और तुम्हारे पास?”
Priya के पास जवाब नहीं था।
Bua ने गंभीर होकर कहा, “बेटा, तू हर रोज़ इतनी कमाती है, पर तूने अपनी आत्मा को कभी खाना दिया? खुशी पैसे से नहीं आती — यह तो तू भी जानती है। खुशी तब आती है जब तू खुद को पहचान ले। जब तुझे पता हो कि तू क्यों जी रही है।”
Priya ने धीरे से पूछा, “और अगर पता न हो तो?”
Kanhiya Bua ने उसका हाथ थाम लिया — रूखे, मेहनतकश हाथों से — और बोलीं:
“तो यहीं आ। यमुना किनारे बैठ। यह नदी हज़ारों सालों से बह रही है। उससे पूछ। वो बताएगी।”
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Priya उस रात hotel नहीं गई।
उन औरतों के साथ घाट के पास एक छोटे से कमरे में रुकी। रात को साथ खाना खाया — मोटी रोटी, आलू की सब्ज़ी, और गुड़। ज़िन्दगी का सबसे स्वादिष्ट खाना था वो।
Radha Dadi ने सोने से पहले एक बात कही जो Priya को नींद के बाद भी याद रही:
“बेटा, हमने किताब नहीं पढ़ी। School नहीं गए। पर ज़िन्दगी ने पढ़ाया — कि हर सुबह उठना एक chance है। हर साँस एक gift है। और हर ‘ना’ जो तू कहती है खुद के लिए, वो एक पाप है — खुद के साथ।”
अगली सुबह Priya उठी। Yamuna के पानी में हाथ डाले। ठंडा था। असली था। उसे याद आया नानी कहती थीं — “यमुना सब बहा ले जाती है।”
उसने आँखें बंद कीं। पहली बार उसने खुद से बात की — बिना judge किए।
उसने खुद से कहा: “मैं काफी हूँ।”
तीन शब्द। पर उस सुबह, वो तीन शब्द उसके लिए तीन जन्मों के बराबर थे।
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Priya Bangalore लौटी। पर वो पहले वाली Priya नहीं थी।
कुछ बदला था। बहुत धीरे-धीरे। जैसे यमुना में एक पत्थर गिरे और लहरें बनें — छोटी-छोटी, पर हर कोने तक जाने वाली।
Office में boss ने एक weekend project दिया। Priya ने पहली बार कहा, “Sir, यह मेरे scope से बाहर है। मैं weekday में देख सकती हूँ।” Boss चुप हो गया। दुनिया नहीं टूटी।
Friend के last minute plan पर उसने कहा, “मुझे आज आराम चाहिए।” Friend ने कहा, “ठीक है।” बस।
रात को नींद थोड़ी बेहतर आने लगी।
Anxiety गई नहीं — पर वो उससे लड़ने लगी। Kanhiya Bua की आवाज़ आती — “पंख हैं तेरे पास।”
उसने एक diary शुरू की। उसमें हर रात एक सवाल लिखती — “आज मैंने खुद के साथ कैसा बर्ताव किया?”
और Vrindavan? वो हर साल जाने लगी। नानी के नाम पर नहीं — अपने नाम पर।
Kanhiya Bua से एक बार उसने कहा, “Bua, आपने मुझे बदल दिया।”
Bua ने हँसते हुए कहा, “हमने? हमने तो बस बात की। तू खुद बदली। हम तो बस आईना थे।”
और Priya को समझ आया — असली आईना किताबों में नहीं मिलता। Courses में नहीं मिलता। Therapy में कभी-कभी मिलता है। पर कभी-कभी वो एक बुज़ुर्ग औरत के हाथों में होता है, जो Yamuna किनारे बैठी हो, और जिसने कभी school नहीं देखा, पर ज़िन्दगी का हर पाठ पढ़ा हो।





