जब दो महासागर मिले शंकराचार्य और मण्डन मिश्र का वह शास्त्रार्थ — जो सिर्फ एक बहस नहीं थी, बल्कि मानवता के सबसे गहरे प्रश्न का सामना था भाग एक — वह सुबह महिष्मती नगरी। लगभग ७८८ ईस्वी। सूरज अभी पूरी तरह उगा नहीं था। एक युवा संन्यासी नगर के बाहर खड़ा था। उम्र थी — …

Shankracharya and Mandana Mishra Shastrath Discussion Debate
Joan Robins
Joan Robins

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जब दो महासागर मिले

शंकराचार्य और मण्डन मिश्र का वह शास्त्रार्थ — जो सिर्फ एक बहस नहीं थी, बल्कि मानवता के सबसे गहरे प्रश्न का सामना था


भाग एक — वह सुबह

महिष्मती नगरी। लगभग ७८८ ईस्वी।

सूरज अभी पूरी तरह उगा नहीं था।

एक युवा संन्यासी नगर के बाहर खड़ा था। उम्र थी — अट्ठाईस वर्ष। पर उन आँखों में जो था — वह हज़ारों वर्षों का बोध था।

उसका नाम था — शंकर। बाद में दुनिया उन्हें आदि शंकराचार्य कहेगी।

वह किसी के घर की तलाश में था। एक विशेष घर। जिसके बारे में उसने सुना था कि वहाँ के तोते और मैनाएँ भी उपनिषद की ऋचाएँ गाते हैं। जिसके स्वामी को पूरा भारत उस युग का सबसे बड़ा विद्वान मानता था।

उस घर का नाम था — मण्डन मिश्र का आवास।

एक बाँदी से रास्ता पूछा।

बाँदी ने कहा — “जिस घर के बाहर पेड़ों पर बैठे तोते ऋग्वेद, सामवेद और उपनिषदों की ऋचाएँ गाते हों — वही मण्डन मिश्र का घर है।”

शंकराचार्य आगे बढ़े।

थोड़ी देर में उन्हें वह घर मिल गया। वाकई — पेड़ों पर बैठे पक्षी वेद-मंत्रों का उच्चारण कर रहे थे।


भाग दो — मण्डन मिश्र — वह महासागर

मण्डन मिश्र उस युग के ऐसे विद्वान थे जिन्हें देखकर खुद भगवान सरस्वती को भी गर्व होता।

वह मीमांसा दर्शन के सर्वोच्च प्रतिनिधि थे। उनकी रचनाएँ — ब्रह्मसिद्धि, विधिविवेक, मीमांसानुक्रमणिका — इन सबने पूरे भारत के दार्शनिक जगत को झकझोर दिया था।

उनका मत था — जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य कर्म है। वेदों में जो विधियाँ हैं — यज्ञ, अनुष्ठान, गृहस्थ धर्म — यही मोक्ष का मार्ग है।

वह गृहस्थ थे। उनकी पत्नी थीं — उभय भारती। जो स्वयं इतनी विदुषी थीं कि लोग कहते थे — वह साक्षात् सरस्वती का अवतार हैं।

मण्डन मिश्र के घर में प्रतिदिन विद्वत्सभा होती थी। देशभर के पंडित आते थे। शास्त्रार्थ होता था। मण्डन मिश्र कभी पराजित नहीं हुए थे।

तब तक।


भाग तीन — शंकराचार्य — वह अग्नि

शंकराचार्य केरल के कालड़ी ग्राम में जन्मे थे।

आठ वर्ष की उम्र में चारों वेद कण्ठस्थ। बारह में षड्दर्शनों का अध्ययन पूर्ण। और सोलह वर्ष की उम्र में — संन्यास।

उनकी माँ आर्यंबा ने रोककर पूछा था — “संन्यास क्यों?”

शंकराचार्य ने कहा था — “माँ, यह जो दिखता है — यह सब सत्य नहीं है। इसके पीछे एक सत्य है जो सबको एक बनाता है। मुझे वह ढूँढना है।”

माँ ने रोने के बाद एक शर्त रखी — “मेरे अंतिम समय पर आना।”

शंकराचार्य ने वचन दिया।

और निकल पड़े।

उन्होंने आचार्य गोविन्दपाद से दीक्षा ली। फिर पूरे भारत में भ्रमण शुरू किया। उनका एक ही उद्देश्य था — भारत की बिखरती हुई आत्मा को एक करना। उस सत्य को स्थापित करना जो उन्हें बाल्यकाल से दिखता था।

वह सत्य था — अद्वैत वेदान्त।


भाग चार — अद्वैत और मीमांसा — दो विश्वदृष्टियाँ

शास्त्रार्थ समझने से पहले यह समझना होगा कि दोनों क्या कह रहे थे। क्योंकि यह शास्त्रार्थ दो व्यक्तियों की लड़ाई नहीं थी। यह दो संपूर्ण जीवन-दृष्टियों का आमना-सामना था।


शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त — “सब एक है”

शंकराचार्य का मूल सूत्र था:

“ब्रह्म सत्यम् जगन्मिथ्या — जीवो ब्रह्मैव नापरः।”

ब्रह्म ही सत्य है। जगत मिथ्या है। जीव ब्रह्म से अलग नहीं है।

इसका अर्थ क्या था?

शंकराचार्य कह रहे थे — यह जो दिखता है, यह जो संसार है, यह जो अनेकता दिखती है — यह सब एक परम सत्ता की अभिव्यक्ति है। वह परम सत्ता है — ब्रह्म।

जैसे एक ही रस्सी को अँधेरे में देखकर हम सर्प समझ लेते हैं — वैसे ही ब्रह्म को अज्ञान के कारण हम जगत समझ लेते हैं।

यह माया है। भ्रम है।

जब माया हटती है — तब ज्ञान होता है कि “अहम् ब्रह्मास्मि” — मैं ही ब्रह्म हूँ।

इसीलिए शंकराचार्य कहते थे — ज्ञान ही मोक्ष का एकमात्र मार्ग है। यज्ञ नहीं। कर्म नहीं। सिर्फ ज्ञान।

और यह ज्ञान — किसी भी व्यक्ति को मिल सकता है। किसी भी जाति में। किसी भी आश्रम में।


मण्डन मिश्र का मीमांसा — “कर्म ही धर्म है”

मण्डन मिश्र का कहना था:

“वेद की विधि ही परम प्रमाण है। जो वेद ने कहा — वह करो। यही मोक्ष है।”

उनका तर्क था — ब्रह्म जो है, वह है। पर उसे जानने की बात सिद्धांत में ठीक है — व्यवहार में कर्म आवश्यक है।

व्यक्ति का जन्म हुआ है — तो उसके कर्तव्य हैं। गृहस्थ का धर्म है। पितृऋण, ऋषिऋण, देवऋण — इन्हें चुकाना है। यज्ञ करने हैं। संतान उत्पन्न करनी है। वंश को आगे बढ़ाना है।

मण्डन मिश्र कहते थे — जो संन्यास लेकर कर्म से भाग जाए — वह धर्म से भाग रहा है।

उनके अनुसार शंकराचार्य का मार्ग — संन्यास का मार्ग — समाज के लिए विध्वंसक था।


भाग पाँच — शास्त्रार्थ की शर्तें

शंकराचार्य जब मण्डन मिश्र के घर पहुँचे — तब मण्डन मिश्र पितृ-श्राद्ध में व्यस्त थे।

शंकराचार्य ने आकर कहा — “शास्त्रार्थ करना है।”

मण्डन मिश्र ने झुँझलाहट से देखा — एक युवा संन्यासी।

“अभी नहीं।”

“कब?”

“जब श्राद्ध पूर्ण हो।”

जब श्राद्ध पूर्ण हुआ — दोनों के बीच शर्तें तय हुईं।

शर्त एक: जो हारे — वह विजेता का मत स्वीकार करे।

शर्त दो: अगर मण्डन मिश्र हारे — तो संन्यास लें। अगर शंकराचार्य हारे — तो गृहस्थ बनें।

शर्त तीन: निर्णायक कौन होगा?

दोनों ने एक स्वर में कहा — उभय भारती। मण्डन मिश्र की पत्नी।

यह अद्भुत था। एक पति ने अपनी पत्नी को निर्णायक माना। और विपक्षी ने भी मान लिया। क्योंकि उभय भारती की विद्वत्ता पर कोई प्रश्न नहीं था।

दोनों के गले में पुष्पमाला डाली गई। जिसकी माला पहले मुरझाए — वह पराजित।


भाग छह — वह शास्त्रार्थ

सभा में सैकड़ों विद्वान थे। कुमारिल भट्ट के शिष्य थे। शास्त्रज्ञ थे। राजदरबार के पंडित थे।

शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ।


मण्डन मिश्र ने पहला प्रश्न किया:

“शंकर, तुम कहते हो — जगत मिथ्या है। पर यह जो सभा बैठी है, यह जो वाद-विवाद हो रहा है — यह सब मिथ्या कैसे हो सकता है? इस भोजन का स्वाद — यह मिथ्या कैसे है?”

शंकराचार्य ने कहा:

“मिश्रजी, स्वप्न में भी भोजन का स्वाद होता है। प्यास लगती है। जल मिलने पर तृप्ति होती है। क्या स्वप्न का जल सत्य है? नहीं — पर उस स्तर पर वह सत्य जैसा लगता है।

व्यावहारिक सत्य और परम सत्य में अंतर है। मेरी मूर्खता नहीं है। यह मेरा दार्शनिक स्तर-विभाजन है।

इस संसार में जल सत्य है। भोजन सत्य है। सभा सत्य है — इस व्यवहार के स्तर पर। पर ब्रह्म के परम स्तर पर — यह सब परिवर्तनशील है। नाशवान है। इसलिए मिथ्या है।

जो नित्य है — वह सत्य। जो अनित्य है — वह मिथ्या।”


मण्डन मिश्र का दूसरा तर्क:

“तुम कहते हो — ज्ञान से मोक्ष। पर ज्ञान किसे होगा? अगर जीव ब्रह्म ही है — तो अज्ञान कहाँ से आया? ब्रह्म सर्वज्ञ है — तो उसे अज्ञान कैसे हो सकता है? और अगर ब्रह्म को अज्ञान नहीं — तो किसे ज्ञान होगा? यह तुम्हारे सिद्धांत का सबसे बड़ा विरोधाभास है।”

यह था मण्डन मिश्र का सबसे तीक्ष्ण तर्क। पूरी सभा स्तब्ध हो गई।

शंकराचार्य ने जो उत्तर दिया — वह भारतीय दर्शन के इतिहास का सबसे सूक्ष्म उत्तर है:

“मिश्रजी, आप सर्प-रज्जु का उदाहरण भूल रहे हैं।

रात के अँधेरे में रस्सी पड़ी है। व्यक्ति उसे सर्प समझता है। भय होता है। वह भागता है।

अब प्रश्न — सर्प था? नहीं था। तो सर्प का भय क्यों था?

क्योंकि अँधेरा था। अज्ञान था।

जब दीपक जला — रस्सी दिखी — भय गया।

अब पूछिए — रस्सी ने कोई कार्य किया? नहीं। रस्सी रस्सी ही रही। भय और अभय — दोनों व्यक्ति के अज्ञान और ज्ञान की अवस्थाएँ थीं — रस्सी की नहीं।

ठीक ऐसे — ब्रह्म में अज्ञान नहीं। जीव में अज्ञान है। पर जीव वास्तव में ब्रह्म ही है — यह उसे पता नहीं। यह अज्ञान-अवस्था में माया से उत्पन्न अभास है।

जब ज्ञान होता है — जीव समझता है — मैं ब्रह्म हूँ। अज्ञान नष्ट होता है। माया हटती है। मोक्ष होता है।

यह विरोधाभास नहीं। यह अनुभव की परतें हैं।”


तीसरा महा-तर्क — मण्डन मिश्र का:

“शंकर, तुम कहते हो — एक ब्रह्म है। अद्वैत। दो नहीं।

तो जब तुम कह रहे हो ‘ब्रह्म सत्य है’ — तब तुम और ब्रह्म — दो हो। तुम बोलने वाले हो। ब्रह्म जाना जाने वाला है। यह द्वैत हुआ। तुम्हारे वाक्य में ही द्वैत है।

जब तक कोई कहने वाला और कोई सुनने वाला है — अद्वैत कहाँ?”

पूरी सभा ने साँस रोक ली।

यह सवाल अद्भुत था।

शंकराचार्य ने उत्तर दिया:

“मिश्रजी, यह शास्त्रार्थ हो रहा है — व्यवहार के स्तर पर। व्यवहार में भेद है। मैं हूँ, आप हैं, यह सभा है।

पर जब ज्ञान होता है — उस अनुभव में कोई वक्ता नहीं, कोई श्रोता नहीं। वह अनुभव भाषा से परे है। वाक्य से परे है।

अमृतानुभव — मोक्ष का अनुभव — वह शब्दों में नहीं आता। जो कहा जा सके — वह पूर्ण सत्य नहीं। जो पूर्ण सत्य है — वह कहा नहीं जा सकता।

मंडूक्य उपनिषद में कहा है — ‘नेति नेति’ — न यह, न यह। ब्रह्म का वर्णन असंभव है। फिर भी शास्त्र वर्णन करते हैं — उसी तरह जैसे माँ बच्चे को चंद्रमा दिखाने के लिए उँगली से इशारा करती है। उँगली चंद्रमा नहीं है। पर उँगली चंद्रमा दिखाती है।

मेरे शब्द ब्रह्म नहीं हैं। पर ब्रह्म की ओर इशारा करते हैं।”


भाग सात — उभय भारती का हस्तक्षेप

सत्रह दिनों तक शास्त्रार्थ चला।

हर प्रश्न का उत्तर। हर उत्तर का प्रश्न।

धीरे-धीरे मण्डन मिश्र की माला मुरझाने लगी।

उभय भारती ने देखा — पति पराजय की ओर जा रहे हैं।

तब उन्होंने एक असाधारण कदम उठाया।

वह शास्त्रार्थ में उतर गईं।

“शंकर, मेरे पति और तुम्हारे बीच शास्त्रार्थ था। पर निर्णायक मैं हूँ। और निर्णय से पहले मुझे तुमसे कुछ प्रश्न पूछने हैं।”

शंकराचार्य ने सहमति दी।

उभय भारती ने पूछा — “तुम कहते हो जीव और ब्रह्म एक हैं। संसार मिथ्या है। तो क्या गृहस्थ जीवन का कोई मूल्य नहीं? क्या काम — कामशास्त्र — इस ज्ञान में कोई स्थान नहीं?”

यह प्रश्न असाधारण था।

शंकराचार्य संन्यासी थे। ब्रह्मचारी थे। कामशास्त्र का उन्हें व्यावहारिक ज्ञान नहीं था।

पर वह हार नहीं सकते थे।

उन्होंने एक महीने का समय माँगा।

उभय भारती ने दिया।


भाग आठ — शंकराचार्य का वह कार्य — परकाया प्रवेश

यहाँ एक ऐसी घटना घटी जो भारतीय दर्शन और yogic tradition के अनुसार संभव मानी जाती है। इतिहास इसे स्वीकार करता है — प्रतीकात्मक या सत्य — दोनों रूपों में।

उसी समय एक राजा — अमरु — का निधन हुआ।

शंकराचार्य ने अपने शिष्यों को अपना शरीर सुरक्षित रखने को कहा — और योगबल से उस राजा के शरीर में प्रवेश किया।

एक महीने तक शंकराचार्य ने राजा के रूप में जीवन जिया। राजमहल में। रानियों के बीच। गृहस्थ जीवन के हर अनुभव को जाना।

और जो उन्होंने सीखा — वह था: गृहस्थ जीवन भी मोक्ष की यात्रा का हिस्सा है। कामना स्वयं बुरी नहीं — आसक्ति बुरी है।

जब वह वापस आए — उन्होंने श्रृंगार शतक और आनंद लहरी जैसी रचनाएँ लिखीं। जिनमें जीवन के उस पक्ष को भी स्थान मिला।


भाग नौ — उभय भारती का निर्णय

शंकराचार्य लौटे।

उन्होंने उभय भारती के सभी प्रश्नों का उत्तर दिया।

उभय भारती लंबे समय तक मौन रहीं।

फिर उन्होंने कहा:

“शंकर विजयी हैं।”

वह खड़ी हुईं। और बोलीं — “पर मैं तुमसे एक बात कहना चाहती हूँ। तुम्हारा अद्वैत सर्वोच्च दर्शन है। पर मण्डन मिश्र का मार्ग — कर्म का मार्ग — समाज के लिए उतना ही आवश्यक है। अधिकांश मनुष्य ज्ञानमार्ग पर नहीं चल सकते। उनके लिए कर्म ही धर्म है। दोनों सत्य हैं — दोनों मार्ग हैं।”

यह वाक्य — इतिहास का सबसे बड़ा synthesis था।

मण्डन मिश्र ने संन्यास लिया। वह सुरेश्वराचार्य हो गए। शंकराचार्य के प्रमुख शिष्य।

वह शत्रु जो था — वह मित्र बन गया।

वह द्वंद्व जो था — वह एकता बन गया।


भाग दस — इक्कीसवीं सदी में इस शास्त्रार्थ का अर्थ

Arjun — जो यह कहानी पढ़ रहा है — Bangalore में IT engineer है।

रात के ग्यारह बज रहे हैं।

वह laptop बंद करता है। थकान है। एक अजीब खालीपन है।

उसे याद आता है — कल presentation देनी है। अगले महीने appraisal है। घर का EMI है। माँ-बाप की चिंता है। और यह सवाल — “यह सब किसलिए?”

वह अपने आप से पूछता है — “क्या मैं वही हूँ जो दूसरे मुझे समझते हैं? या मैं कुछ और हूँ?”

यही शंकराचार्य का प्रश्न था।

यही मण्डन मिश्र का उत्तर था।

और दोनों का synthesis — यही आज के जीवन का रहस्य है।


पहला अर्थ — तुम वह नहीं हो जो तुम समझते हो

शंकराचार्य का “अहम् ब्रह्मास्मि” — मैं ब्रह्म हूँ — यह अहंकार का वाक्य नहीं है।

यह सबसे बड़ा विनम्रता का वाक्य है।

इसका अर्थ है — तुम्हारी जो पहचान है — Software Engineer, Manager, Father, Husband — यह सब तुम्हारी role हैं। तुम्हारी identity नहीं।

तुम उससे बड़े हो।

इक्कीसवीं सदी में — जहाँ हर व्यक्ति अपनी LinkedIn profile, Instagram feed, job title से अपनी identity define करता है — शंकराचार्य का यह सूत्र सबसे बड़ा antidote है।

“जगन्मिथ्या” — यह कहना कि संसार मिथ्या है — इसका अर्थ यह नहीं कि office मत जाओ। इसका अर्थ है — office तुम्हारे लिए है, तुम office के लिए नहीं।


दूसरा अर्थ — कर्म अनिवार्य है — पर आसक्ति विष है

मण्डन मिश्र ने कहा — कर्म करो।

शंकराचार्य ने कहा — ज्ञान रखते हुए कर्म करो।

Bhagavad Gita ने दोनों को एक किया — “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी बीमारी है — outcome anxiety। Result की चिंता इतनी अधिक कि process का आनंद चला जाता है।

शंकर-मण्डन शास्त्रार्थ कहता है — कर्म करो पूरी शक्ति से। पर फल पर अपना identity मत बनाओ।

अगर promotion मिली — ठीक है। नहीं मिली — ठीक है।

यह surrender कमज़ोरी नहीं। यह सबसे बड़ी शक्ति है।


तीसरा अर्थ — हर विरोध में एकता छुपी है

मण्डन मिश्र और शंकराचार्य — दोनों विरोधी लगते थे।

कर्म बनाम ज्ञान। गृहस्थ बनाम संन्यास। विधि बनाम अनुभव।

पर शास्त्रार्थ के अंत में — वह एक हो गए।

इक्कीसवीं सदी में — हर जगह polarization है। Hindu-Muslim। Left-Right। Science-Religion। Urban-Rural।

शंकर-मण्डन शास्त्रार्थ कहता है — हर सत्य आंशिक है। जब तक दोनों पक्ष अपना पूरा सत्य रखते हैं — तब synthesis संभव है।

Debate जीतना उद्देश्य नहीं। Truth discover करना उद्देश्य है।


चौथा अर्थ — उभय भारती का संदेश — स्त्री-बुद्धि सर्वोच्च निर्णायक है

उभय भारती ने शास्त्रार्थ का निर्णय दिया।

एक पत्नी ने अपने पति की पराजय स्वीकार की — सत्य के लिए।

यह साधारण बात नहीं।

इसका अर्थ है — जब ego कहता है “मेरा पति सही है” — तो भारती ने कहा “सत्य सही है।”

इक्कीसवीं सदी में — परिवारों में, relationships में, politics में — यह capacity कि हम अपने प्रियजन की गलती को भी गलती कह सकें — यही सबसे बड़ी नैतिक शक्ति है।


पाँचवाँ अर्थ — “नेति नेति” — uncertainty को accept करो

शंकराचार्य ने कहा — “नेति नेति” — न यह, न यह।

ब्रह्म को पूरी तरह define नहीं किया जा सकता।

यह scientific honesty है।

आज का science भी कहता है — “We don’t know.” Quantum mechanics में particle wave है — particle भी है। दोनों भी है। न भी है।

Heisenberg का uncertainty principle कहता है — तुम position और momentum दोनों simultaneously नहीं जान सकते।

शंकराचार्य ने यह बारह सौ साल पहले कहा था — “अनिर्वचनीय है।” जिसे पूरी तरह वर्णन न किया जा सके।

इक्कीसवीं सदी में — जहाँ हर व्यक्ति हर बात का instant answer चाहता है — यह “नेति नेति” की शक्ति को समझना सबसे बड़ी intellectual maturity है।


भाग ग्यारह — वह दीपक जो बुझा नहीं

Arjun ने laptop बंद किया।

आँखें बंद कीं।

एक प्रश्न उठा — “मैं कौन हूँ?”

शंकराचार्य का उत्तर था — “तुम ब्रह्म हो।”

मण्डन मिश्र का उत्तर था — “तुम गृहस्थ हो। अपना कर्म करो।”

उभय भारती का उत्तर था — “दोनों सत्य हैं। तुम दोनों हो।”

Arjun ने आँखें खोलीं।

बाहर Bangalore की रात थी।

पर उसे एक अजीब शांति थी।

जैसे हज़ार साल पुराना एक दीपक — जो कभी बुझा नहीं — उसके कमरे में भी जल उठा।


अंत — वह प्रश्न जो अनंत है

शंकराचार्य और मण्डन मिश्र दोनों चले गए।

उभय भारती चली गईं।

महिष्मती नगरी के खंडहर बच गए।

पर वह प्रश्न बचा रहा।

“मैं कौन हूँ?”

“यह जीवन किसलिए है?”

“कर्म करूँ या ज्ञान पाऊँ?”

यह प्रश्न हर सुबह उठता है।

हर उस इंसान के साथ जो थोड़ा रुककर सोचता है।

शंकराचार्य ने कहा था — “चर्पट पञ्जरिका स्तोत्र” में:*

“भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् गोविन्दम् भज मूढमते।”

भज गोविंद — उस परम से जुड़ो। ओ मूढ़ मन — यह शास्त्र, यह व्याकरण, यह calculation — मृत्यु के समय काम नहीं आएगा।

मण्डन मिश्र ने जो ब्रह्मसिद्धि में कहा था — वह भी यही था — “अंततः वही सत्य है जो नित्य है।”

दोनों ने अलग-अलग रास्तों से एक ही सत्य को छुआ।

जैसे दो नदियाँ — अलग पहाड़ों से निकलकर — एक ही समुद्र में मिलती हैं।


“एकं सत् विप्राः बहुधा वदन्ति।” सत्य एक है — विद्वान उसे अनेक प्रकार से कहते हैं। — ऋग्वेद, १.१६४.४६

“ब्रह्म सत्यम् जगन्मिथ्या — जीवो ब्रह्मैव नापरः।” ब्रह्म सत्य है — जगत मिथ्या है — जीव ब्रह्म से अलग नहीं है। — आदि शंकराचार्य

“नेति नेति।” न यह — न यह। ब्रह्म इससे परे है। — बृहदारण्यक उपनिषद


उन सभी Arjun के लिए — जो रात को laptop बंद करके पूछते हैं — “यह सब किसलिए?”

वह प्रश्न सही है।

वह प्रश्न ही यात्रा की शुरुआत है।

शंकराचार्य और मण्डन मिश्र ने तुम्हारे लिए एक हज़ार साल पहले ही उत्तर रख दिया था।

बस पढ़ना था। 🙏

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