वृन्दावन की ओर जब थकान इतनी गहरी हो जाए कि रास्ता दिखना बंद हो वृन्दावन में एक पुरानी धर्मशाला थी — यमुना किनारे, जहाँ शहर की आवाज़ें आते-आते थक जाती थीं। वहाँ के बुज़ुर्ग सेवादार बाबा मनोहर दास कहते थे — "जो बहुत दूर से आते हैं, वे यहाँ किसी काम से नहीं आते। वे …

बिहारी जी बुला रहे हैं
Joan Robins
Joan Robins

I set up this blog to share interior design, travel and lifestyle inspiration for simple, relaxed living at home and beyond. You’ll find home tours, advice and tips, interviews, reviews, postcards from places I love and more – always with a focus on minimalism, muted colours and timeless, considered design.

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वृन्दावन की ओर

जब थकान इतनी गहरी हो जाए कि रास्ता दिखना बंद हो

वृन्दावन में एक पुरानी धर्मशाला थी — यमुना किनारे, जहाँ शहर की आवाज़ें आते-आते थक जाती थीं। वहाँ के बुज़ुर्ग सेवादार बाबा मनोहर दास कहते थे —

जो बहुत दूर से आते हैं, वे यहाँ किसी काम से नहीं आते। वे खुद को ढूँढने आते हैं।

उस एक सप्ताह में चार लोग आए — चार अलग शहरों से, चार अलग ज़िंदगियों से। पर उनके भीतर एक ही बात थी जो टूट रही थी, बिना किसी शोर के।

बर्नआउट कोई कमज़ोरी नहीं है। यह उस इंसान की निशानी है जो बहुत लंबे समय से बहुत ज़्यादा देता रहा — और जिसने खुद को देना भूल गया।

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एपिसोड १ · गृहिणी

मुंबई → वृन्दावन

मीना और वो सुबह जब उसने खाना नहीं बनाया

मीना शाह, ३८ वर्ष। मुंबई के एक मध्यवर्गीय परिवार की गृहिणी। पति सॉफ्टवेयर कंपनी में, बेटा नौवीं में, सास की दवाइयाँ, घर का राशन, स्कूल की फ़ीस — सब उसके हाथों से होता था। किसी ने कभी नहीं पूछा — मीना, तुम कैसी हो?

और मीना ने खुद से भी नहीं पूछा था।

एक मंगलवार की सुबह, वह रसोई में गई। गैस जलाई। कड़ाही रखी। और फिर बस खड़ी रही। दस मिनट। बीस मिनट। कुछ नहीं हो रहा था — न हाथ उठ रहे थे, न मन में कोई विचार था। बस एक खालीपन, जो पेट से नहीं, भीतर से था।

बेटे ने आकर कहा — “माँ, आज टिफिन नहीं बना?” मीना ने जवाब दिया — “हाँ, बेटा।” पर आँखें भर आईं, और वो नहीं जानती थी क्यों।

बर्नआउट के क्लासिक संकेत — गृहिणी सुबह उठते ही थकान — पूरी रात सोने के बाद भी रोज़मर्रा के काम में कोई अर्थ न दिखना खुद की ज़रूरतें भूल जाना — क्या पसंद है, क्या नहीं समय का बोध खोना — दिन, हफ्ते एक जैसे लगना जिन लोगों से प्रेम था, उनसे चिढ़ महसूस होना

उस दिन बाद में पड़ोसन सुनीता ने कहा — “अरे, मेरी माँ वृन्दावन जा रही हैं तीर्थ के लिए। तू भी चल। चार दिन।” मीना ने मना करने की कोशिश की। पर जो बोलना था वो निकला नहीं। उसने हाँ कह दी।

वृन्दावन में वह पल यमुना के किनारे, सूर्यास्त के समय, मीना बस बैठी रही। कोई काम नहीं, कोई ज़िम्मेदारी नहीं। एक बूढ़ी माँ पास बैठी थी जो भजन गुनगुना रही थी। मीना को अचानक याद आया — उसे भी गाना आता था। बचपन में। उसने आँखें बंद कीं। पहली बार तीन साल में उसे नहीं पता था घड़ी में क्या बजा है।

जब औरत थक जाती है, तो घर थकता है। पर कोई नहीं देखता। क्योंकि वो थककर भी चलती रहती है।
— बाबा मनोहर दास, धर्मशाला, वृन्दावन

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एपिसोड २ · कॉर्पोरेट

दिल्ली → वृन्दावन

आयुष और वो मीटिंग जिसमें वो कुछ बोल नहीं पाया

आयुष मेहता, ३४ साल। दिल्ली की एक बड़ी IT कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर। सात साल में पाँच प्रमोशन। LinkedIn पर तीन हज़ार कनेक्शन। और एक सुबह, एक अहम प्रेज़ेंटेशन के बीच — पूरी तरह blank।

स्क्रीन पर स्लाइड थी। बोर्डरूम में छह लोग थे। आयुष ने माइक्रोफ़ोन पकड़ा और… कुछ नहीं। दो मिनट की चुप्पी। उसने एक जोक मारा, किसी ने हँसा, मीटिंग आगे बढ़ी।

उस रात उसने खुद से पूछा — मैं यह क्यों कर रहा हूँ?” और जवाब नहीं मिला।

बर्नआउट के क्लासिक संकेत — कॉर्पोरेट प्रोफेशनल मीड-सेंटेंस भूल जाना — बात करते-करते खो जाना काम में पहले जो passion था, वो गायब लैपटॉप खोलते ही अजीब-सी घबराहट और anxiety दिनभर थका, रात को नींद नहीं दोस्तों से मिलना बंद, हर वीकेंड बस सोना या स्क्रीन

उसके पुराने दोस्त सार्थक ने कहा — “यार, मैं अगले हफ्ते वृन्दावन जा रहा हूँ। बस घूमने। आएगा?” आयुष ने कहा — “क्या रखा है वहाँ?” सार्थक ने कहा — “कुछ नहीं। इसीलिए जा रहा हूँ।” आयुष का जवाब था — “ठीक है।” खुद को नहीं पता था क्यों।

वृन्दावन में वह पल बाँके बिहारी मंदिर में भीड़ थी। आयुष पीछे खड़ा था। अचानक मंगल आरती शुरू हुई — घंटियाँ, शंख, भजन। उसने notice किया कि उसका फ़ोन जेब में था और उसने उसे निकाला नहीं। तीन मिनट। शायद पाँच। पहली बार महीनों में वो किसी notification का इंतज़ार नहीं कर रहा था।

तुम भागते इसलिए नहीं कि तुम्हें कहीं जाना है। तुम भागते इसलिए हो क्योंकि रुकना डरावना लगता है। यहाँ रुको। डर देखो। वो तुम्हीं हो।
— बाबा मनोहर दास

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एपिसोड ३ · व्यवसायी

बेंगलुरु → वृन्दावन

राहुल और वो रात जब उसे अपनी कंपनी से नफ़रत हो गई

राहुल जोशी, ४२ साल। बेंगलुरु में एक mid-size logistics कंपनी के मालिक। पन्द्रह कर्मचारी, तीन शहरों में ऑफिस, बैंक लोन, GST, vendor payments, staff issues — सब उसके कंधे पर। हर सुबह वो सबसे पहले उठता था और हर रात सबसे आखिर में सोता था।

एक रात उसने अपनी कंपनी का नाम Google पर search किया। एक पुराने review में किसी ने लिखा था — “Good company, but owner is always stressed and never smiles.” राहुल रुका। उसे याद नहीं आया कि आखिरी बार उसने ठहरकर हँसा कब था।

कंपनी बन गई थी — पर इंसान कहीं खो गया था।

बर्नआउट के क्लासिक संकेत — उद्यमी हर decision में डर — जो पहले excitement था वो anxiety बन गई कर्मचारियों से चिड़चिड़ापन — छोटी गलतियाँ बड़ी लगना पैसा आ रहा है पर संतोष शून्य — ‘इतना काफ़ी नहीं है’ का भाव BP, acidity, सिरदर्द — शरीर बोलने लगा जो मन नहीं बोल सका “यह सब किसलिए?” — यह सवाल हर सुबह

उसकी माँ ने कहा — “बेटा, Janmashtami पर वृन्दावन चलते हैं। बस दो दिन।” राहुल ने सोचा — दो दिन कंपनी बिना मेरे नहीं चलेगी। फिर उसने सोचा — शायद यही समस्या है।

वृन्दावन में वह पल धर्मशाला के आँगन में एक बुज़ुर्ग सज्जन बैठे थे — रिटायर्ड। राहुल ने पूछा — “आप क्या करते थे?” उन्होंने कहा — “बड़ी कंपनी चलाता था। एक दिन डॉक्टर ने कहा — अगर नहीं रुके तो सब चलता रहेगा, बस तुम नहीं रहोगे।” राहुल ने पहली बार किसी की बात ध्यान से सुनी।

व्यापारी जो धन कमाता है वो माया है। जो खुद को जानता है वो अर्थ है। दोनों एक साथ हो सकते हैं — पर पहले ठहरना पड़ता है।
— बाबा मनोहर दास

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एपिसोड ४ · डॉक्टर कोलकाता → वृन्दावन

डॉ. प्रिया और वो मरीज़ जिसे वो देख नहीं सकी

डॉ. प्रिया सेन, ४५ साल। कोलकाता के एक सरकारी अस्पताल में वरिष्ठ फिज़िशियन। बीस साल की सेवा। रोज़ सत्तर से अस्सी मरीज़। रात की ड्यूटी, सुबह OPD, बीच में calls।

एक शाम एक बुजुर्ग मरीज़ आया — chest pain। प्रिया ने जाँचा, prescription लिखी, अगला मरीज़। बाद में नर्स ने बताया — वो बुजुर्ग बाहर बैठकर रो रहे थे। पूछने पर बोले — “डॉक्टर ने देखा, पर लगा जैसे देखा नहीं।”

प्रिया ने यह सुना और उसी रात diary निकाली। उसने दस साल पहले लिखा था — “मैं डॉक्टर इसलिए बनी ताकि लोगों का दर्द देख सकूँ।” वो दर्द देखना कब बंद हो गया, याद नहीं।

Compassion Fatigue — जब देखभाल करने की क्षमता ही चुक जाए।

बर्नआउट के क्लासिक संकेत — डॉक्टर / केयरगिवर Compassion fatigue — मरीज़ की तकलीफ़ अब affect नहीं करती रुटीन mechanical हो जाना — diagnosis है, doctor नहीं खुद की सेहत ignore करना — सबको ठीक करती है, खुद बीमार “क्या मैं सही काम कर रही हूँ?” — पहली बार गहरा संदेह निजी ज़िंदगी शून्य — परिवार से भावनात्मक कटाव

उसकी एक junior colleague ने कहा — “दीदी, मैं मथुरा-वृन्दावन जा रही हूँ छुट्टी पर। तीन दिन। आइए ना।” प्रिया ने कहा — “मैं डॉक्टर हूँ, मुझे छुट्टी नहीं होती।” Colleague ने धीरे से कहा — “दीदी, इसीलिए तो।”

वृन्दावन में वह पल यमुना में एक बच्चा कागज़ की नाव बहा रहा था। प्रिया रुककर देखती रही। नाव डूबी। बच्चे ने दूसरी बनाई। फिर बहाई। प्रिया की आँखों में आँसू थे — इसलिए नहीं कि दुखी थी, बल्कि इसलिए कि वो महसूस कर रही थी। वापस। फिर से।

वैद्य का काम केवल शरीर ठीक करना नहीं — पर खुद वैद्य का शरीर और आत्मा भी तो ज़िंदा रहनी चाहिए। जो दीपक बुझ गया, वो दूसरे को रोशनी कैसे देगा?”
— बाबा मनोहर दास

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उपसंहारधर्मशाला · वृन्दावन

वो रात जब चारों मिले

संयोग से — या शायद संयोग नहीं — वह सप्ताह एक ही था। मीना, आयुष, राहुल और प्रिया — चारों उसी धर्मशाला में ठहरे थे। रात को यमुना घाट पर दीप जलाने का कार्यक्रम था।

बाबा मनोहर दास वहाँ बैठे थे। चारों अलग-अलग बैठे थे — पर एक ही चुप्पी में। आरती समाप्त हुई। दीप बहाए गए।

जानते हो यमुना किनारे लोग क्यों आते हैं? नहाने नहीं। बहाने। जो बोझ बन गया, उसे यहाँ बहाते हैं। थकान। ग़ुस्सा। खालीपन। यमुना लेती है — बिना पूछे कि कहाँ से आए हो।
— बाबा मनोहर दास

मीना ने पूछा — “फिर वापस जाकर क्या?” बाबा मुस्कुराए — “वही काम। वही घर। वही दफ्तर। वही मरीज़। पर अब तुम थोड़े ज़्यादा तुम हो। और यही काफ़ी है शुरू के लिए।”

बर्नआउट से बाहर आने के पाँच पहले क़दम

वृन्दावन जाना ज़रूरी नहीं। पर रुकना ज़रूरी है।

  • रुकें और स्वीकारें — बर्नआउट कमज़ोरी नहीं, एक संकेत है।
  • एक दिन ‘कुछ नहीं’ का — बिना productivity के, बिना list के।
  • किसी एक व्यक्ति से सच बोलें — जो आप महसूस कर रहे हैं, शब्दों में।
  • शरीर सुनें — नींद, खाना, धूप — ये medicine हैं।
  • Purpose खोजें, न targets — “मैं यह क्यों कर रहा हूँ?” का उत्तर ढूँढें।

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जब राह थकी हो और क़दम न उठें,

तो रुक जाना कोई हार नहीं।

दीपक बुझने से पहले एक पल ठहरता है —

उसी पल में उसकी असली रोशनी है।

— वृन्दावन की ओर | HappinessisPossible.com

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